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डील्लीराम भण्डारी"यात्री"
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भारतीय प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदीले नेपालको प्रशंसा गरेका छन्। भारतको ६८ औं स्वतन्त्रता दिवसलाई सम्बोधन गर्दै मोदीले आन्तरिक द्वन्द व्यवस्थापनका सम्बन्धमा नेपालबाट विश्वले पाठ लिनसक्ने बताएका हुन्।नयाँ दिल्लीस्थित लालकिल्लामा आयोजित समारोहलाई सम्बोधन गर्ने क्रममा मोदीले भगवान बुद्ध भुमी कसरी युद्धबाट शान्ति र लोकतन्त्रतर्फ अगाडि बढ्न सक्यो भन्ने कुरा भारतले समेत सिक्नुपर्ने बताए।
त्यसैगरी, प्रधानमन्त्री मोदीले समारोहमा आफ्नो सरकारको प्रथामिकता समेत प्रस्तुत गरेका छन्। विशेषगरी उनले देशको सरसफाई अभियान, बलत्कार, साम्प्रदायिक हिंसाको अन्त्य र विकास सरकारको प्रथामिकता भएको जानकारी दिए। साथै, देशको विकासका मुद्दामा पब्लिक-प्राइमेट पार्टनसिप (पिपिपी)लाई मुख्य जोड दिने बताएको भारतीय सञ्चारमाध्यमले जनाएका छन्।
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डील्लीराम भण्डारी"यात्री"
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नेपाल से जुड़ी वो दस बातें, जिन्हें आप शायद नहीं जानते होंगे
इंटरनेशनल डेस्क। चीन ने कहा है कि नरेंद्र मोदी की नेपाल यात्रा सफल साबित हुई है। चीन की सरकारी न्यूज एजेंसी शिन्हुआ ने कहा, "17 साल में पहली बार गए किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने नेपालियों को दिल जीत लिया है। वे रिश्तों को काफी आगे और नई ऊंचाइयों पर ले गए हैं। हालांकि, नेपाल को अब संदेह हो सकता है कि कहीं भारत उसके ऊर्जा क्षेत्र पर एकाधिकार न जमा ले।"
गौरतलब है कि नेपाल के अगल-बगल में विश्व की दो बड़ी आर्थिक महाशक्ति भारत और चीन है। वह पर्यटकों के बीच लोकप्रिय देशों में से एक है। 147,181 किलोमीटर में फैला दक्षिण एशिया का यह शहर नेचुरल रिसोर्सेस और प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है। यह छोटा-सा पहाड़ी देश हाइड्रोपावर, राफ्टिंग और माउंटेन ट्रैकिंग के लिए भी मशहूर है। विभिन्न देशों के पर्यटक माउंट एवरेस्ट (दुनिया का सबसे ऊंचा पर्वत) और अरुण घाटी (सबसे गहरी घाटी) को देखने आते हैं।
इस देश में विभिन्न जाति और धर्म के लोग रहते हैं। कई सालों से माओवादी संघर्ष में उलझे होने के कारण यहां नया संविधान बनना बाकी है। इससे इसके विकास पर काफी प्रभाव पड़ा है। इन सबके बावजूद नेपाल प्राकृतिक स्रोतों सहित कई मामलों में अन्य देशों से आगे है।
जानिए नेपाल से जु़ड़े 10 फैक्ट्स...
दुनिया का सबसे स्लो इंटरनेट
नेपाल दुनिया का दूसरा देश हैं, जहां इंटरनेट की गति बहुत धीमी है। यहां 32 फीसद इंटरनेट कनेक्शन या 60 फीसद लोगों का इंटरनेट 256 kbps से भी कम स्पीड में चलता है। नेपाल में कई IPSs और कम्युनिकेशन फर्म कम दाम में इंटरनेट की गति को तेज करने का प्रयास कर रही हैं।
आगे पढ़ें: हमेशा गुल रहती है बिजली...
हालांकि, नेपाल का स्थान वाटर रिसोर्स के मामले में दुनिया में दूसरे नंबर पर है। अगर इसका समुचित उपयोग किया जाए तो यह देश हाइड्रोपावर के क्षेत्र में दुनिया में एक बड़ी ताकत बन सकता है। अभी तक नेपाल में लगभग 83,000 मेगावाट हाइड्रोपावर का उत्पादन होता है। यहां के बेकार इन्फ्रास्ट्रक्चर की वजह से यह देश बिजली पैदा करने में अभी काफी पीछे है। यहां लोगों को रोजाना 9-12 घंटे ही बिजली मिलती है और हर सीज़न में 3 से 4 बार पावर कट होता है। इसी वजह से यह देश इंडस्ट्री, फैक्ट्री और ऑफिस की मूलभूत सुविधाओं के मामले में अभी भी अन्य देशों की अपेक्षा काफी पिछड़ा हुआ है। तंबाकू के लिए फेमस
नेपाल कभी चरस-तंबाकू आदि के लिए बहुत फेसम था। 70 और 80 के दशक में नेपाल की राजधानी काठमांडू में हिप्पीज लोग चरस और अन्य नशे के लिए आया करते थे। इस देश में वीड (चरस, तंबाकू) खरीदना, बेचना और इस्तेमाल करना गैरकानूनी है। फिर भी लोग चोरी-छिपे इसका व्यापार करते हैं। अभी भी वहां तंबाकू की अवैध खेती की जाती है। वर्ल्ड हेरिटेज साइट
15 किलोमीटर के एरिया में नेपाल में सात हेरिटेज साइट्स आती हैं। इनमें पशुपतिनाथ मंदिर, स्वयंभूनाथ मंदिर, बुद्ध स्तूप, काठमांडू, भक्तपुर और पटन दरबार स्क्वॉयर शामिल हैं। यह सभी हेरिटेज काठमांडू वैली के तीन जिलों काठमांडू, भक्तपुर और ललितपुर में पड़ते हैं। नमस्ते करना
नमस्ते करना वैसे तो भारतीय परंपरा में अभिवादन करने का तरीका है। लेकिन नेपाल में भी हाथ मिलाकर या गले लगकर नहीं, बल्कि हाथ जोड़कर अभिवादन करने की परंपरा है। नेपाल के भारत से सटे क्षेत्रों में नमस्ते के साथ ही बड़े बुजुर्गों के पांव छूकर आशीर्वाद लेना भी अभिवादन करने का एक तरीका है। अनेकता में एकता
‘यूनिटी इन डायवर्सिटी’ स्लोगन के साथ नेपाल के लोग देशप्रेम और राष्ट्रीयता को बहुत मानते हैं। नेपाल में भगवान बुद्ध के प्रति लोगों में जबरदस्त श्रद्धा की भावना देखी जा सकती है। महाशिवरात्रि के अवसर नेपाल का बहुत बड़ा त्योहार है। इस मौके पर पशुपतिनाथ मंदिर में अपार भीड़ उमड़ती है। नेशनल फ्लैग
दुनिया में नेपाल का झंडा ही ऐसा है, जो चतुर्भुज नहीं है। इसके अलावा सभी देशों के झंडों के चार कोने होते हैं। हाल में हुए एक रिसर्च में यह माना गया है कि नेपाल का झंडा एक मैथेमैटिकल झंडा है, जो इस देश की पहचान बताता है। नीला बॉर्डर और लाल रंग के साथ ही झंडे में बना चांद और सूरज और दो त्रिकोण हिमालय और दो धर्म हिंदू और बौद्ध को दर्शाते हैं। माउंटेन क्लाइंबिंग, ट्रैकिंग और राफ्टिंग
नेपाल में 8 सबसे ऊंचे पहाड़ या चोटियां हैं। इस वजह से यह देश माउंटेन क्लाइंबिंग, ट्रैकिंग और राफ्टिंग के लिए ट्रैवलर के बीच खासा चर्चित है। यहां हिमालय की वजह से लोग वैसे ही आकर्षित हो जाते हैं, जिस वजह से माउंटेन क्लाइंबिंग करने वालों के लिए यह जन्नत है। वहीं, यहां की त्रिशूली नदी भी रिवर राफ्टिंग करने वालों के बीच बहुत प्रसिद्ध है। एक अनुमान के अनुसार, राफ्टिंग और ट्रैकिंग में रुचि रखने वाले दुनिया के 20 फीसदी से ज्यादा लोग यहां आते हैं। कई रिकॉर्ड हैं देश के नाम
नेपाल के नाम दुनिया के कई रिकॉर्ड हैं। इसमें से सबसे पहले 8,848 मीटर की ऊंचाई वाला माउंट एवरेस्ट है। इसके साथ ही यहां धरती की सबसे ऊंची 4800 मीटर की तिलिचो झील, 3600 मीटर ऊंचाई वाली 145 मीटर गहरी Shey phoksundo झील, 1200 मीटर गहरी Kalidanki वैली और सबसे ऊंची अरुण घाटी है। इसके अलावा भी नेपाल के नाम कई वर्ल्ड रिकॉर्ड हैं, जैसे दुनिया का सबसे छोटा आदमी चंद्र बहादुर इसी देश का है। गोरखा सैनिकों की अतुलनीय बहादुरी
नेपाल के पड़ोसी देश भारत और चीन पर अंग्रेजों ने सालों साल राज किया, लेकिन कोई भी ताकत आज तक नेपाल को हाथ नहीं लगा सकी है। इसका श्रेय 'गुरखा' को जाता है। नेपाल के गोरखा बहादुरी और पराक्रम के लिए जाने जाते हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण विश्व युद्ध में उनका प्रदर्शन था।
श्रोत :- दैनिक भास्कर
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डील्लीराम भण्डारी"यात्री"
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हातमा सुनको चैन, गलामा सुनको मोटो लामो सिक्री, झलल झल्किने टाई सुट, ऐना सरि टल्किने जुत्ता, एक दुइ करोडको घडी, हिन्दा पनि स्लो इमोशनमा टक्क आउछन अनि नेपाली नेताहरुलाइ उत्तेजित हुने छेद बिक्षद पार्ने खालको ब्यबाहार गरेर राजनीतिक दलहरुलाई औलो हालेर धर्मको कुरो अनि धम्कि पूर्ण सैलिमा सन्धि सम्झौता र नेपालि राजनीतिलाइ नया हिंशा तर्फ धकेल्ने गरि मोदी आउदै छन् हामि सबैले सायद यस्तै सोचेका थियौ, हाम्रो मनमा मोदीको आगमनले पिडा दिईरहेको थियो,
तेस्माथी पनि नेपाल सरकारले गरेको भब्य स्वागत र उनले बिमान मार्फत पठायका दुइ वटा अरबौ रुपियाका गाडीले पनि मनमा संका पैदा गरेको थियो,
नेपाली समय अनुसार साउनको अठार गते बिहान दस पचपन्न बजे नेपाली भूमिमा भारतीय प्रधानमन्त्रि मोदीले पाइलाटेके, बिमान बाट मन्द मुस्कुराउदै एक जना व्यक्ति झरे जसको सरिरमा साधारण दौरा सुरुवाल एउटा स्टकोट सामान्य जुत्ता अनि हातमा सामान्य घडी, उनि बिमान बाट ओर्लिय अनि हात हल्लाउँन सुरुगरे, उनको स्वागतमा प्रतीक्षा गरिरहेका नेपालका प्रधानमन्त्रीले जानी नजानी स्वागत गरे, नेपालि प्रधानमन्त्रि सुसिल कोइराला चिटिक्क परेर कालो चस्मामा सजियका थिय, लाग्थ्यो भर्खर कुरकुरे बैश चढेको नौ जवान, धोका दियो चाउरी परेको गाला अनि सेताम्मे फुलेका रौ हरुले, मोदी हायात hotel पुगेर केहि छिन बिश्राम गरे लगत्तै दिउस संसद भबन पुगे, उनको मन्तब्य र नेपालिलाइ सम्बोधन गर्ने कार्यक्रममा मोदीले नेपालि भाषा बाट बोल्न सुरु गरे, म भने एक छिन अल्मल्लीय, होइन के हुदै छ, एक जना भारतीय प्रधानमन्त्रि नेपालि भाषामा सम्बोधन गर्दै छन् ? कसले सिकायो होला, लेखेर दियको पनि कति सुद्द बोलेको, आहा मनमा कति आनन्द आयो, एउटा बिदेशी मुख्य सक्तिले नेपाली भाषामा नेपालीलाई सम्बोधन गर्दा अति आनन्द यो मनमा, उनि बोल्न सुरु गर्दै उनले सुरुमै नेपालको बरण मात्र सुरुगरेनन, उनि आफु गौरब भयको समेत जानकारी गराय, उनले गौतम बुद्दको देशमा सान्तिको कामना गर्न आयको जानकारी दिय, पसुपतिको देशमा दर्शन गर्न र आफुले आसिर्बाद लिन आयको जानकारी मात्र गरायनन सम्पूर्ण भारतीय नागरिकलाई पनि आकर्सण हुने गरि सम्बधन गरे, नेपालले सहयोग चाहे भारतीय नागरिकहरुलाई पर्यटनको रुपमा नेपाल भित्र्याउन सक्ने र आफुले सहयोग गर्ने जानकारी दिय, नेपालले बिजुली उत्पादन गरेर नेपाललाई मात्र होइन भारतलाइ पनि उज्यालो दिन र ब्यापार गर्न आग्रह गरे, उनको मुख बाट निस्कियको हर सब्दले एउटा मात्र भाब झल्किन्थ्यो, नेपाल नरहे भारत रहदैन, nepal कम्जोर भय भारत सक्षम हुन सक्दैन, नेपाललाइ बिस्वका समृद्द देशहरु संग हातमा हात काधमा काध मिलायर हिड्द सक्ने सक्षम मुलुकको रुपमा देख्न चाहेको जस्तो बुझिन्थ्यो, उनि बोल्दै गय, उनि बोल्दै गर्दा एस्तो लाग्थ्यो पशुपतिनाथ मन्दिर छोडेर साक्षात इस्वरिय सक्तिमा संसद भबन प्रवेश गरे अनि नेपाली जनता लाइ सम्बोधन र नेपाली नेतालाई परिवर्तनको सिक्षा दिय, उनि बोल्दै गर्दा संसद भबन उल्लासमय बनेको थियो, हिजो bharat मुर्दाबाद भन्नेहरु लज्जास्पद हुदै टुलुटुलु हेरिरहेका थिय, भारतीय मन्त्रि बोल्दै गय समय सकिदै गयो, तर हाम्रो लागि समय प्रयाप्त भयन हामि अझ धेरै नेतालाई सिक्षा दियको हेर्न चाहान्थेउ, अन्त्यमा उनले नेपाललाई एक खर्ब बराबर नेपालि रुपिया सहयोग गर्ने घोषणा गरे, संसद भबन तालीले गुन्जयमान बन्यो, कतिले त सायद औला भाच्दै थिय होला, मेरो भागमा कति पर्यो,
यसरी भारतीय मन्त्रिले आफ्नो मन्तब्य टुंग्याय, हायत hotel तर्फ जादै गर्दा उनले आफ्नो स्वागतमा रहेका सर्बसाधारण नेपालि देखे, अनि गाडी बाट उत्रिय र स्वागत ग्रहण गरे, हात मिलाय हात हल्लाय, उनि साच्चै महान व्यक्ति हुन, उनीमा जादु छ, मैले भने दुइ वटा कुरा सम्झीरहेको थिय, संबिधान सभा एक हुदा प्रचण्डले गलामा भिरेको माला, प्रचण्डलाइ नेपालि जनताले गरेको बिस्वास, उनले पायको सम्मान, प्रचण्ड द्वारा रास्ट्र नेर्तित्वको प्रतीक्षा, अनि प्रचण्डले एक बर्ष बित्न नपाउदै नेपाली जनतालाई दियको निराशा धोका, उनको पदमोह ब्यबाहार, उनको मस्ती गर्ने सैलीको व्यक्तित्व, प्रचण्डलाइ अवसरले साच्चै पछ्छ्यायको थियो,तर उनले त्यो अवसर गुमाय,
मोदीको अनुहारमा देखियको इस्वरिय सक्तिको रुप अस्ति प्रचण्ड माथि पनि देखेका थिय नेपाली जनताले, तर त्यो अमुल्य घात संबिधान सभा दुइमा महँगो साबित भयो, उनको पाटीले नराम्रो हार ब्योहोर्नु पर्यो, मलाइ बिस्वास छ मोदीको आगमनले नेपालि राजनीतिलाई नया उर्जा दियको हुनुपर्छ, मेरा नेताहरुमा केहि सकारात्मक सोचको बिकाश भयको हुनुपर्छ, एध्धेपी भयन भने नेपालि राजनीत कुकुरको पुच्छार ठहरिने छ,
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डील्लीराम भण्डारी"यात्री"
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कनकमणि दीक्षित
आज नन्दप्रसाद र गंगामाया अधिकारीको आमरण अनशनको २७० दिन भएको छ। नसाबाट कहिले जाने कहिले नजाने गरी ‘इन्ट्राभिनस्’ स्लाइन लगाएका कारण उहाँहरू जीवित रहनुभएको छ। शरीरका ‘अर्गन’ हरू आजसम्म ठीकै देखिएका छन् तर जीउ भने हाड–छाला मात्रको अवस्थामा पुगेको छ। गंगामायाको अनुरहारमै निरन्तर पीडा झल्कन्छ भने अघिल्ला दिनमा बोल्न र तर्क गर्न नथाक्ने नन्दप्रसाद आगन्तुकलाई टोलाएर मात्र हेर्नुहुन्छ, प्रतिक्रिया बेगर।
तर आजभोलि आगन्तुक पनि त्यत्तिको छैनन्। मुख्यतः ‘संक्रमणकालीन न्याय’ सम्बन्धी राज्यको कर्तुत तथा दम्पतीको अनशन नत्याग्ने निरन्तर अडानको अगाडि भूमिकाहीन बन्न पुगेका कारण अधिकारकर्मीदेखि अन्य हितैषी तथा सरकारी कर्मचारीको वीर अस्पतालको ‘पुरानो आईसीयू’ को शैय्या नं १७ र १८ मा भेट्न आउनेको संख्या झण्डै शून्यमा झरेको छ।
आज आएर अधिकारी दम्पतीको स्याहार, रेखदेख तथा चासोमात्र त्यहाँ खटिएका प्रहरी जवान तथा आइसियूका नर्स र डाक्टरको हातमा पुगेको छ। दम्पतीको प्रसंगसँग परिचित वीर अस्पतालका निर्देशक डा. बुलन्द थापाले अवकाश पाइसकेका छन् भने संवेदनशील रहेका प्रधानमन्त्री कार्यालयका सचिव कृष्णहरि बाँस्कोटा पनि एक–दुई दिनमा अवकाश लिंदैछन्।
स्वास्थ्य सन्दर्भ चिकित्सक तथा नर्स टोलीको प्रयासले यतिका दिन सुतेरै बस्दा पनि ‘प्रेसर सोर’ ले दम्पतीलाई दुःख दिएको छैन। तर मुखबाट खाना नछिरेको २७० दिन भइसक्दा जीउमात्र छालाले मोडेको हाडमा परिणत छ। घाँटीको नसाबाट ‘टोटल प्रोटिन न्यूट्रिसन’ दिन सम्भव थियो तर गंगामायाको त्यो प्रसारण गर्ने ‘सेन्टर लाइन’ नली पनि टालिएको छ। नन्दप्रसादको उक्त नली खुला छ तर लिन मानेका छैनन्, नर्सका अनुसार। केही हप्तालाई ‘टिपिएन’ को थैली पनि आउन छाडेको थियो, आपूर्ति गर्ने ‘हनुमान फर्मा’ लाई सरकारले शुरूदेखिको खर्च नदिलाएकाले, तर मिडिया रिपोर्टिङको कारणले हुनुपर्दछ अहिले थैली उपलब्ध छ। नन्दप्रसाद र गंगामायाको अवस्था हेर्दा कुनै पनि बेला शरीरको कुनै अंगको ‘अर्गन फेल्योर’ हुन सक्दछ, चिकित्सक भछन्। यत्तिको लामो समय, दुई–दुई जना आमरण अनशनकर्ता आफ्नो अभियानलाई निरन्तरता दिनुले उहाँहरूको अठोट, आत्मबल तथा मुलुक–समाजको अवस्था दर्शाउँछ।
दम्पतीको अडान हरेक सरोकारवाला तथा भेट्न जानेलाई यही लाग्दछ कि दम्पतीले यस्तो कठोर अवस्थामा आफ्नो अनशन किन जारी राखेको? खिलराज रेग्मी सरकारको बेला मन्त्रीहरूको विशेष संवेदनशीलता थियो, र यसअघि विभिन्न दलका शीर्षस्थ नेताले भेट्न गएकै हुन् एक–एक गरी, र दम्पतीलाई आफ्नो छोराको हत्याको सन्दर्भमा न्याय दिलाउने कबुलसहित फर्कन्थे। तर ती नेताकै अगुवाइको वर्तमान सरकार दम्पतीसित बिल्कुलै टाढा रहेकोले बदलिएको राजनीतिक माहोल दर्शाउँछ। लोकतान्त्रिक नेताले मंसिरको निर्वाचनपछि दम्पतीको अवहेलना गरेका छन्। उनीहरूको अभियान र अनशनलाई झन्झटको रूपमा लिएका छन्।
मुद्दा उही, तर राष्ट्रियदेखि अन्तर्राष्ट्रिय हरेक क्षेत्रबाट अधिकारी दम्पतीको अनशनबारे चासो र सरोकार घटेको छ, तैपनि उहाँहरू आफ्नो अनशन तोड्न मान्नुहुन्न। यसको कारण यति मात्र हुन सक्दछ— मनमस्तिष्कमा ९ वर्ष अगाडि यातना दिई–दिई माओवादीद्वारा चितवनमा मारिएका छोरा कृष्णप्रसाद अधिकारीको झल्झली सम्झना तथा उनका हत्याराहरूमाथि कारबाहीको चाहना। अरू कुनै कारण हुन सक्दैन यत्तिको पीडा उहाँहरूले सहनुको, न कसैको उक्साहट न न्यायभन्दा अरू कुनै ‘फल’ को प्राप्ति। अनशनको दिन बढ्दै जाँदा उहाँहरूलाई सरकारले केही गर्ला भन्ने विश्वास हरायो र नेपालमा न्याय सम्पादन कति खस्केको रहेछ भन्ने उहाँहरूको अड्कल सावित हुँदै गयो, यसले अनशनलाई निरन्तरता दिने अठोट बढाइदियो, घटाउनुभन्दा।
अधिकारकर्मीको भूमिका मानवअधिकारकर्मीहरूको नजरमा अधिकारी दम्पतीले आफ्नो छोराको हत्यारालाई कठघरामा देख्ने चाहना राख्नु एकदमै उचित हो, यो त नागरिक दायित्व समेत हो। आफूलाई प्रत्यक्ष पीडा नपरेकाले ‘फर्गिभ एण्ड फर्गेट’ भन्दै सुझाव दिनु सजिलो होला, तर न्यायको खोजी पीडित परिवारको नितान्त निजी अधिकार अन्तर्गत पर्दछ। नन्दप्रसाद र गंगामाया जस्ता धेरै पीडितजन सामाजिक अवहेलना खेप्दै न्यायको लडाइँमा लागिपरेका छन्।
अधिकारकर्मीले ‘डलरखेती’ गर्दै अधिकारी दम्पतीलाई अनशन बस्न उक्साएको भन्ने आरोप तेस्र्याइने गरिन्छ मुख्यतः माओवादी प्रोपोगाण्डा अन्तर्गत। र नेतागणदेखि अलिपरबाट यो प्रसंग नियालिरहेका व्यक्तित्वहरूको अधिकारकर्मीसँग आग्रह हुने गर्दछ, “लौ न अनशन छुटाउन लगाउनु पर्यो !” यसले अधिकारी दम्पतीको अडान र अभियानको अपर्याप्त बुझाइ झल्काउँछ र न्यायको खोजीमा लागेका उहाँहरूप्रति असंवेदनशीलता। अधिकारकर्मीहरूले बारम्बार दम्पतीलाई निजी र सार्वजनिक आह्वानद्वारा अनशन तोड्न गरेको पहलप्रति पनि यस्तो अभिव्यक्तिले अन्याय गर्दछ। मानौं, अधिकारकर्मीले वास्तवमा अधिकारी दम्पतीलाई उक्साएकै हो, र ती अधिकारकर्मीले भन्दाखेरी उहाँहरूले अनशन अन्त्य गरिहाल्नुुहुन्छ। अघिल्लो पटक २३ भदौ २०७० बिहान वरिष्ठ सरकारी कर्मचारी तथा अधिकारकर्मीको पहलमा अधिकारी दम्पतीले ४७ दिनमा अनशन तोडेकै हुन्, तर उहाँहरूले कबुल गरिएका बुँदाहरूको सन्दर्भमा सरकारी निष्क्रियताको निन्दा गर्दै कसैसँग सम्पर्क नगरी ८ कात्तिक २०७० मा पुनः दोस्रो पटक अनशन थाल्नुभएको हो।
सरकारी दायित्व सरकारी पहललाई नजरअन्दाज गर्न मिल्दैन। आफ्नो नागरिकप्रतिको दायित्व निर्वाह गरी गंगामाया–नन्दप्रसादको सुरक्षासहित स्वास्थ्य सम्बन्धी जिम्मा सरकारले लिएकै हो, लिनुपर्ने पनि थियो। माओवादी दबाबमा कतिपय कुरामा सुस्तता हुँदाहुँदै पनि प्रहरीले अनुसन्धान अगाडि बढाएकै हो। सरकारी अनुसन्धानले कृष्णप्रसादलाई चितवन, टाँडीको बकुलर चोकमा हत्या गर्नेमध्ये दुईको द्वन्द्वकालमा मरण भएको र एक उत्तरी आयरल्याण्डमा रहेको पत्ता लगायो। यस्तै सरकारले चितवन जिल्लामा कारबाही पनि अगाडि बढाएकै हो।
अधिकारी दम्पतीको फुजेल गाउँका सम्भवतः हत्यामा संलग्न मतियारलाई समाउन आग्रह थियो भने सरकारी ध्यान वास्तवमा गोली चलाउने माथि केन्द्रित थियो। ‘मतियार’ आरोपितहरूलाई समाती तारेखमा छुटाउने काम भयो जसले दम्पतीलाई रुष्ट तुल्यायो। अधिकारी दम्पतीलाई धेरैचोटि अधिकारकर्मीहरूले सम्झाउन खोजेकै हुन् कि गोली चलाउने पक्राउ परेपछि अरूहरूको पोल खुल्दछ। तर फुजेलमा बस्ने दम्पती भने आफ्ना गाउँका मतियारतर्फ मात्र लक्षित रहनुभयो, चितवनमा हत्या गर्ने ‘शार्पशूटर’ उहाँहरूको लागि अलिपरको कुरा जस्तो देखियो।
माओवादी प्रभाव सम्पूर्ण द्वन्द्वकालका घटना छानबिन र कारबाहीको सन्दर्भमा सरकार, नागरिक समाज तथा बौद्धिक वर्गलाई माओवादी अडान र अभिव्यक्तिले असर पारेको देखिन्छ। माओवादी दल द्वन्द्वकालका कुनै पनि घटनालाई अनुसन्धान र कारबाहीमा नलग्ने पक्षमा छ।
शान्ति सम्झौतामा द्वन्द्वको क्रममा मारिएका घटनामा छुट दिने भनेको छ भने माओवादी ‘द्वन्द्वकाल’ का हरेक घटनाको मुद्दा फिर्ता वा निष्क्रिय गराउन चाहन्छ। एउटै पनि द्वन्द्वकालका जघन्य अपराधका दोषीमाथि अनुसन्धान र कारबाही भए आफ्नो पार्टी संरचना गल्र्याम्गुर्लुम् भत्कने डर माओवादी नेतृत्वलाई छ। एउटामाथि कारबाही भए उसले सबैको पोल खोलिदिनेछ भन्ने आशंका छ। यसै कारण माओवादीले हर तरिकाले कृष्णप्रसादको हत्याको छानबिन तथा न्यायिक प्रक्रियालाई अवरोध पु¥याउन चाहन्छ, अन्य अभियोगमा जस्तै— डेकेन्द्र थापा, गुरुप्रसाद लुईंटेल, अर्जुनबहादुर लामा, उज्जनकुमार श्रेष्ठ इत्यादिको हत्या सन्दर्भ।
माओवादी सरकार र सत्तामा रहँदासम्म एमाले र कांग्रेसले द्वन्द्वकालका पीडितलाई आफ्नो सहयात्री सम्झेका थिए होलान्। तर जब मंसीर २०७० को निर्वाचनद्वारा यी दुई दल सत्ता सम्हाल्न पुगे, अरू नै कुरा उनीहरूको प्राथमिकतामा पर्यो, र पीडितजनलाई चटक्कै बिर्सिदिए। एक त संविधान बनाउने बेलामा माओवादीलाई बखेडा गर्न अवसर नदिनु उचित भन्दै माओवादी क्रियाकलापलाई तर्क र मानवीयताको सिद्धान्तद्वारा सामना गर्नुको साटो पीडितको मुद्दालाई ओझेलमा पार्न एमाले र कांग्रेसको नेतृत्व राजी भए। जुन कारणले सत्य निरुपण आयोगको कानून पीडकमैत्री हुनगयो, त्यसैगरी पीडितको फौजदारी न्याय अन्तर्गत जघन्य अपराध गर्नेलाई कारबाहीको मागको पनि बेवास्ता भयो। यसै बेवास्ताको शिकार फुजेल गाउँका अधिकारी दम्पती पनि पर्न गए। एमाले र कांग्रेसले निर्वाचन जित्नुको एउटा मूल कारण थियो, पीडितहरूको साहसिक क्रियाशीलता जसले माओवादीको वास्तविक क्रूर अवसरवाद र हत्या–हिंसा मोह छरपस्ट पारिदियो, तर पहिलो घडीमै यी दुई विजेता दल पीडितलाई अवहेलना गर्न र छेउ पार्न अग्रसर भए।
नेपाल सेना यो सब सन्दर्भमा चुपचाप देखिए पनि उसको पर्दा पछाडिको अडानले पीडितको अभियानलाई असर पारेको छ। माओवादी ज्यादतीकर्तालाई कारबाही गर्ने भए आफ्नो माझका ज्यादतीकर्तालाई पनि अदालतीय कारबाही हुने हुँदा सेनाले कांग्रेस र एमाले माथि दबाब पारेको छ र यसको प्रत्यक्ष असर अधिकारी दम्पतीलाई परेको छ। माओवादी, सेना, कांग्रेस र एमालेले आफ्नो स्वार्थ हेरे, वीर अस्पतालको पुरानो आईसीयूका अनशनरत दुई ज्यानलाई मृत्युतर्फको यात्राबाट बचाउन आवश्यक ठानेनन्।
छोरा नूरप्रसाद र मातापिताको सत्याग्रह स्वर्गीय कृष्णप्रसादका दाइ नूरप्रसाद पनि द्वन्द्वपीडित परिवारका सदस्य हुन् मातापिता जस्तै। उनले पनि धेरै भोगे। यसअघि ४७ दिनको अनशन तोडाउन उनले पनि अन्ततोगत्वा सहयोग गरेकै हुन्। तर अधिकारकर्मीहरूले दोस्रो अनशनको दौरानमा जेठा छोरासँग घरी–घरी सहयोग माग्दा उनी “मेरा बुबाआमाले जे चाहनुहुन्छ त्यही गर्नुहुन्छ” भन्ने अभिव्यक्ति दिंदै पन्छिए। अधिकारकर्मीको विचारमा एउटा छोराले बाबुआमाको सन्दर्भमा पु¥याउनुपर्ने संवेदनशीलता उनले देखाएनन्, जबकि अधिकारकर्मीको भन्दा उनको आह्वान माता र पिताले सुन्ने र अनशन तोड्ने सम्भावना अलिकति भए पनि थियो। तर उनले पहल गरेनन्। अधिकारकर्मीहरूसँगको विभिन्न छलफलमा उनी यत्तिको चर्को बोले कि ‘हामी शान्तिपूर्ण समस्या समाधानमा विश्वास गर्छौं’ भनी सार्वजनिक विज्ञप्ति निकाल्नुपर्ने अवस्था आयो।
नन्दप्रसाद तथा गंगामायाको अनशनलाई सत्याग्रह नै भन्नुपर्छ किनकि उहाँहरूले मात्र कानूनको बाटो रोजेको र अनुसन्धानको माग राखेको हो।
स्व. कृष्णप्रसादकी माता गंगामाया अनशनमा स्वेच्छाले बसेको हो कि होइन भन्ने पनि प्रश्न उठ्न सक्दछ, र नन्दप्रसादलाई यो लेखक लगायतले पनि गंगामायाको अनशन तोडाउन आग्रह गरेका थियौं। नन्दप्रसादले हामीसामु त्यसो गर्न मान्नुभएन, ‘उनको आफ्नो विचार हो’ भन्दै। तर गत केही महीनाको दौरानमा दुईचोटि यो लेखक गंगामायासँग नजिक गई एक्लै कुरा गर्दा उनी राजीखुशी अनशनमा बसेको भान हुन्थ्यो, ‘अब त मरिने भो क्यार, न्याय पाइने भएन। .... न्याय पाएको हामीले शायद माथिबाट हेरौंला अब। .... हरेक चोटि कृष्णप्रसादको याद आउँछ र मुटुमा कीला रोपे जस्तो हुन्छ....’ — यस्तो थियो उहाँको अभिव्यक्ति।
यस लेखकको बुझाइमा नन्दप्रसाद तथा गंगामायाले अनशन आफ्नो ज्यान लिने गरी बस्नुको दुइटा कारण छः १) दिवंगत छोराको याद मानसपटलमा घरी–घरी आउने अथवा ल्याउन सक्ने मानसिक शक्ति। २) न्याय प्रक्रियामाथिको अडान र आस्था।
अधिकारकर्मीहरूले सरकारलाई न्याय प्रक्रिया अगाडि बढाउन धेरै प्रयास गरेको र त्यो कुरा दम्पतीलाई सुनाउँदै अनशन अन्त्य गर्न धेरै पटक आग्रह गरेकै हो, निजी भेटमा र सार्वजनिक आह्वान समेत गर्दै। तर उहाँहरूले स्वीकार्नुभएन। नन्दप्रसाद र गंगामायाले अनशन अन्त्य नगर्नाले धेरैलाई अप्ठेरो र असजिलो भएको त छ, तर दम्पतीको पीडा, एक्लोपन र मनको विह्वलतासामु ती अप्ठेराहरू केही पनि होइनन्।
एक जना होइन, दुई–दुई जनाको यस्तो अठोट र अडानको पनि शायद विश्वमा अन्यत्र धेरै उदाहरण पाइँदैन। यसरी सत्याग्रहमा बस्ने दम्पतीमाथि जसरी अनादर र गालीको वर्षा भएको छ, त्यस्ता विचार र बोलीलाई सहज आत्मसात् गर्न मिल्दैन। जबकि दम्पतीले ज्यान साँच्दै न्यायको लागि लडेको उचित हुने भनी धेरैचोटि उहाँहरूलाई सम्झाइएको छ। यो लेखकको मान्यता पनि उहाँहरू बाँचेर लड्नुपर्छ भन्ने हो, तर राज्य र न्यायप्रणालीमा अविश्वासको कारण म नतमस्तक हुन सक्छु, तर दम्पतीलाई गाली गर्न भने सक्दिनँ।
फुजेल सन्दर्भ गोरखाको फुजेल गाउँका माओवादी समर्थकहरू अधिकारकर्मीसँग आक्रोशित भएको देखिन्छ, अधिकारी दम्पतीको मुद्दालाई लिएर अगाडि बढेको कारण। उनीहरूले अधिकारी दम्पतीको गाउँमा त्यतिको राम्रो सामाजिक छवि नभएको कुरा अगाडि सार्दछन्, जबकि आमा र बुबाको समस्या १६ वर्षे छोरालाई हत्या गर्न हुने हो होइन उनीहरू आफैंले बुझ्नुपर्ने कुरा हो। फेरि वास्तविक हत्यारालाई नखोजी आफूलाई फन्दामा पारेको भन्ने आरोप पनि उनीहरू लगाउँछन्। त्यसो हो भने वास्तविक हत्यारा खोज्न आफू समर्थक रहेको माओवादी पार्टीको नेतृत्वलाई दबाब दिन उहाँहरूको कर्तव्य हुनुपर्ने हो।
सच्चा अधिकारकर्मीको माग यत्ति मात्र हो कि वास्तविक हत्यारा तथा हत्याका मतियारहरूलाई न्यायको कठघरामा उभ्याइयोस्। जघन्य अपराधलाई आममाफी दिनुहुन्न, र फौजदारी न्याय प्रणाली अन्तर्गत दण्डित हुनुपर्दछ भन्ने मान्यता अन्तर्राष्ट्रिय पनि हो, आम नेपाली नागरिकको मान्यता पनि हो। यो पनि अन्तर्राष्ट्रिय र नेपाली मान्यता हो कि निर्दोष कोही माथि नाजायज कारबाही नहोस् र गलत या पूर्वाग्रही आरोप खप्नु परेकाहरूले सफाइ पाउन्। तर भान यस्तो हुन्छ कि अधिकारी दम्पतीको दुखद् निधन हुन गयो भने सबै मतियार र आरोपितलाई ‘हाइसञ्चो’ हुन्छ। सच्चा नागरिकले हत्याराको खोजीमा सघाउनुपर्ने हो। कसैको ज्यान हरण हुनुहुँदैन, र कृष्णप्रसादको भएको छ।
संक्रमणकालीन न्याय द्वन्द्वपीडित समुदाय र अधिकारकर्मीहरूको विरोधका बाबजूद सत्य निरुपण आयोगको त्रुटिपूर्ण कानून बन्नाले नन्दप्रसाद र गंगामायाको सत्याग्रहलाई ओझेलमा पारिदिएको छ। यो ठूलो त्रासदी हो। ‘हामीले गर्न सक्ने जति गर्यौं अब सबै सत्य निरुपण आयोगको हातमा छ’ भन्दै सरकार र दलका नेतृत्व पन्छिन पाएका छन् जबकि जानाजान पीडकमैत्री कानून आफैंले बनाएका छन्। अन्य द्वन्द्वकालका मुद्दा जस्तै नन्दप्रसाद र गंगामायाको अभियान पनि छेउ लागेको छ र यो अझै कठोर छ किनकि विना आश उनीहरूले अनशनलाई निरन्तरता दिएका हुन्। न त सही संक्रमणकालीन न्यायप्रणाली अगाडि बढ्ने देखिन्छ, न त उत्तरी आयरल्याण्डमा रहेका हत्यारा आरोपितलाई चितवन जिल्ला अदालतको आदेश अनुसार नेपाल ल्याउन सक्रिय पहल गरेको देखिन्छ। अब त अधिकारकर्मीले अनशन तोड्नुस् भनेर तर्क गर्ने ठाउँ नै रहेन, यसैले टुलुटुलु उहाँहरूको अवस्था बिग्रेको देख्नुबाहेक अरू गर्न सक्ने केही छैन। आफ्नो ज्यान बचाउन राष्ट्रिय तवरका नेताहरू लस्करै विदेश गइरहेछन् भने द्वन्द्वपीडितका प्रतीक अधिकारी दम्पतीलाई वीर अस्पतालको शैय्यामा विलीन हुन दिइरहेछन्।
सामाजिक निरंकुशता न्यायको लागि नन्दप्रसाद र गंगामाया अनशनमा बस्दा धेरैलाई असहज लागेको छ। आफ्नो निष्क्रियता या निष्प्रभाविकताको सन्दर्भमा चित्त बुझाउने धेरै बौद्धिक र विचार निर्माणकर्ताहरूले या त दम्पतीलाई नै गाली वर्षाउने गरेका छन् या त अधिकारकर्मीलाई ‘उक्साएको’ भनेर आरोप लगाउने गरेका छन्। जबकि सही बाटो भनेको ज्यादतीकर्तालाई कठघरामा ल्याउन न्यायको आवाजमा आफ्नो बोली मिसाउनु उचित हुनेथियो।
‘नन्दप्रसादले दुई अर्ब मागे’ भन्दै धेरैलाई पैसाको खेल त रहेछ नि भनेर आफूलाई पन्छिन सजिलो भएको छ। तर त्यो त राज्यसत्ताद्वारा नागरिक समाजप्रतिको आक्रोशको रूपमा लगाइएको आरोपको रूपमा लिनुपर्ने हो, छातीमाथि हात राखेर हेर्ने हो भने। तर नन्दप्रसादले दुई अर्ब मागे भनेर हामी एक–एक नागरिकलाई सजिलो बनाइदिएको छ, दम्पतीको अनशनबारे सैद्धान्तिक अडान नबनाउन र नलिनको लागि। ‘ए, यो त पैसाको खेल त रहेछ नि’, भन्दै हामी पन्छिन पायौं। आफ्नो नागरिक दायित्व पूरा नगर्ने, आफ्नो साहसको कमी लुकाउने र अर्कामाथि गाली थुपार्न रुचाउने बढ्दो प्रवृत्तिलाई ‘दुई अर्ब’ प्रसङ्गले सजिलो बनाइदियो— न्याय, अदालतीय कारबाही, माओवादी आचरण र आफ्नो अकर्मण्यताबारे केही भन्नै परेन। कमजोर बन्दै गएका दम्पतीलाई पैसाखोर भन्न पाइयो, जसरी मानवअधिकारको कुरा गर्नेलाई डलर खेताला भनी हियाउन पाइयो।
नागरिक समाजका ‘अगुवा’ भनिनेहरूले नन्दप्रसाद–गंगामायाको न्यायको मागबारे शब्दोच्चारण नगरेकोमा शायद इतिहासले उहाँहरूलाई प्रश्न गर्नेछ। शक्तिको भक्तिमै त सबथोक अडेको हुँदैन। यस्तै दम्पतीलाई ‘कसैले उक्साएको’ भनेर पन्छिन खोज्ने नेपाली कांग्रेस र एमालेका नेता र अन्य विश्लेषकलाई पनि धिक्कार्नुपर्ने हुन्छ, आफ्नो मानवीयता तथा तर्क–क्षमता बिर्सेकोमा।
यो पनि सम्भव छ कि नन्दप्रसाद र गंगामायाको दुखद् निधन हुन गए वर्तमान शिथिल र गैर जवाफदेही राजनीतिक वातावरणमा समाज हल्लिने अवस्था नआउला। तर नेपालको इतिहासले उहाँहरूको सत्याग्रहलाई उच्च सम्मान दिनेछ किनकि यो न्याय प्राप्तिद्वारा समाज रूपान्तरण गर्ने दर्शनमा आधारित छ, हत्याप्रति संवेदनशीलतामा आधारित छ, आफूलाई दुःखदिने तर अरूलाई नदुखाउने अहिंसामा आधारित छ।
नन्दप्रसाद र गंगामायालाई वीर अस्पतालमा रहेको कुरा बिर्सिन सबैलाई सजिलो भएको छ। आखिर उनीहरूले आफैंलाई हानि गरेका छन्, कसै विरुद्ध हात उठाएका छैनन्, र न्यायप्रणाली अन्तर्गत नै जान कोशिश गरेका छन्। आफूले भनेजस्तो नहुँदा आफैं भष्म हुन तयार छन्।
हरेक तरिकाले हरेक कोणबाट हेर्दा नन्दप्रसाद र गंगामायाको सत्याग्रहको अवहेलना भएको छ, राज्यको बौद्धिक, सरकारी, दलीय तथा नागरिक समाज क्षेत्रबाट। उहाँहरूले प्राण त्याग्नुभयो भने तत्कालै धेरैलाई केही असर नपर्ला, तर इतिहासले हामी सबलाई धिक्कार्ने छ।
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डील्लीराम भण्डारी"यात्री"
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नेकपा एमालेको नवौ महाधिवेशनले कसैलाई नेतृत्वमा पु¥यो भने कसैले पराजयको पीडा भोगे , अर्को तर्फ भने एमाले महाधिवेशनका लागि भोटिङ मेसिन तयार पर्नेहरुको भने सपनै टुट्यो , उनीहरु यतिबेला ठुलो आर्थिक भारको पीडाले भौतारिरहेका छन । एमाले महाधिवेशनकालागि तयार गरिएको विद्युतिय भोटिङ मसिन निर्माता युवा वैज्ञानिक राम, लक्ष्मण र केबीले यसरी पोखे जयदेशसंवाददाता कृष्ण गिरीसंग पिडा उनीहरुकै शब्दमा तयार पारिएको रिपोर्ट -
पहिला ४० वटा मसिन राखौला एमाले महाधिवेशनमा भन्ने थियो । तर पछि हामीले ७०वटा जति बनाउनु पर्छ भन्ने भयो । किनकि २ हजार देखि २२ सय प्रतिनिधिले भोट हाल्दा सात आठ घण्टामा सक्ने भन्ने थियो । त्यसै बिच एमालेसंग पनि कुरा अगाडि बढ्यो । उनीहरुलाई
भोटीङ मसिन
हामीले एड्भान्स माग्यौ ।उनहरुले पनि हुन्छ भने । हामीले उनीहरुसंग बसेर छलफल ग¥यौ । दुई सय जनालाई छान्नु पर्ने रहेछ त्यो पनि पाँच सय बाट । हामीले त्यसको लागि थ्रि डि डिजाइन बनायौ । अन्तिमा उनले भने हामीलाई भोटिङ मसिन १९ गते चाहिन्छ । हामीले पनि त्यो समयमा मसिन बनाएर दिने भयौ । एक मसिनको एक लाख पर्छ । तपाईको महाधिवेशनमा जम्मा जम्मी ७० वटा मसिन चाहिन्छ । ती सबै मसिन तपाइहरुको लागिमात्र बनाउने हो । तपाईहरुले किन्नु होस् पनि भनेका थियौ । तर पछि हामीले नै भन्यौ कि मसिन हामीनै राख्छौ । तपाईहरु हामीलाई भाडा दिनु होला । हामीले यस्तो भन्नुको कारण थियो एमालेको महाधिवेशनमा प्रयोग भएपछि हामीलाई अरुले पनि विश्वास गर्छ । हाम्रो मार्केट बढ्छ । अहिलेलाई घाटा भएपनि पछिलाई फाइदा हेरेर काम गर्न तयार भएका हौ । एमालेको निर्वाचन आयोग र हामी बिच सम्झौता भयो । हामीले दश लाख मागेका थियौ । उनीहरुले पहिलो किस्ता स्वरुप पाँच लाख दिए । हामी पनि ढुक्क थियौ । एमाले जस्तो पार्टीले अर्डर दिदा हामीले निकै जिम्मेवारीका साथ काम ग¥यौ । हामीले मसिन बनाउदै थियौ । केहि मसिन बनी सकेका थिए । एक दिन हामीलाई पार्टी कार्यलयमा बोलाए । हामी दुई मसिन लिएर गयौ । त्यहाँ हामीले मसिनमा भोट हाल्न सिकायौ । झलनाथ खनालले पनि भोट हाल्न सिक्नु भयो । त्यो कुरा पत्रपत्रिकामा पनि आयो । त्यसपछि एमालेका विभिन्न समुहहरु आउने क्रम शुरु भयो , समुहलाई उत्तर दिदा दिदा हैरान भयौं । विभिन्न किसमका मान्छे आउथे मसिनका बारेमा सोध्थे हामी जवाफ दिन्थ्यौ । कोहि पार्टीका हौ भन्दै आउथे । कोहि पार्टीका इन्जिनियर हौ भन्थे । सबैलाई मसिन देखाउथ्यौ । सोधेका प्रश्नको जवाफ दिन्थ्यौ । नेपालमा प्रयोग भइरहेका मसिन पनि कुनै स्टन्र्डड छैनन् हामीले बनाएको मसिन मा दुई ठाँउमा डाटा सेभ हुने बनाएका छौ । भारतबाट ल्याएर निर्वाचन आयोगले प्रयोग गरेको मसिनमा एक ठाँउमात्र डाटा सेभ हुन्छ । एक पटक भोट गनिसके पछि दोबारा त्यहाँ कुनै कुरा हेर्न मिल्दैन ।
एभरेष्ट होटलमा बोलाएर सारै बेइज्जत गरे
२१ गते बानेश्वरको एभरेष्ट होटलमा बोलायो । हामी दुई जना गयौ (राम रिमाल र के बि भण्डारी ) त्यहाँ दस बाह्र जना बसेका थिए । हामी पुग्ने बित्तिकै परिचय माग्यो । हामीले परिय दियौ । उनीहरुले आफ्नो परिचय नै दिएनन् । हामीले तपाईहरुको पनि परिचय दिनु होस् भन्दा बल्ल बल्ल परिचय दिए । त्यहाँ हामीलाई प्रविधि संग भन्दा पनि कसरी तल देखाउने बाहेक अरु केहि काम भएन । केहि समय पछि भीम रावल र माधव नेपाल आउनु भयो । उहाँ दुई जनाले हुन्छ भनेका थिए । उहाँहरु त्यहाँ हुन्जेल माधव नेपालका भाई र उनका पिए मोहन गौतम केहि बोल्नु भएन । नेपाल पन्ध्र मिनेट बसेर जानु भयो र रावल आधा घण्टा । उहाँ दुई जना गएपछि त्यहाँ बसेका दस बाह्र जनाको टोलीका काम भनेको हामीलाई जसरी हुन्छ निच देखाउने । उनीहरुले हामीले लिएर गएको मसिन लाई छुन सम्म छोएनन् । दस मिटर टाढा राखेर मसिनका बारेमा कुरा गरे । त्यहाँ अन्य दुई चार जना ठेट्ना इन्जिनियर लिएर आएका थिए । बाहिर पढेका हौ भन्ने घमण्ड बढी रहेछ । थ्यौरीटीकल कुरा गरेका थिए । प्राइटिकल ज्ञान जिरो रहेछ । पाँच घण्टा पछि बल्ल छोडे । पाँच घण्टा सम्म हामीलाई हिरासतमा राखेको जस्तो व्यवहार गरे । हामी प्राविधिक होइनौ एमालेका अपराधि हौ जस्तो भयो । हामी उनीहरुको हिरासतमा राखिएका छौ । देशको दोस्रो ठूलो पार्टीको कार्यकर्ताको व्यवहार भनेको घटिया रहेछ । अनुशासन भन्ने कुन चराको नाम हो ? उनलाई थाह नै रहेन छ । माधव नेपालका भाई र उनका पिएले नै हो हामीलाई सबै भन्दा अपमान गरे र एमालेको नवौ महाधिवेशनमा भोटीङ मसिनको पै्रयोग हुन दिएनन् ।
नेपालमा स्र्टान्र्डड मापन गर्ने संघसंस्था खोइ त ?
हामीले बनाएका भोटीङ मसिनका बारेमा लास्टमा आएर स्टान्र्डडको कुरा उठाए ।नेपालमा स्टान्र्डड दिने आधिकारीक निकाए खै त देखाई दिउन एमालेका मान्छेहरुले । उनीहरुपनि सत्ता घटक दलका मान्छेहरु हुन् । उनीहरुले भरखर्र उपनिर्वाचनमा प्रयोग गरेको भोटीङ मसिनको स्टान्र्डडता देखाइ दिउन त । चुनौति भयो उहाँहरुलाई । भारतबाट ल्याएको मसिन (VVPAT) voter verified paper audit trail होइन । नेपालीले आफ्नै सिप र प्रविधिमा बनाएको कुराको विरोध मात्र गरेनन् अपमान पनि गरे । हामीले मसिनको प्राविधिक कुरा हेर्न भनेर पुल्चोक इन्जिनियर क्याम्पसलाई,टियूलाई र अरुलाई पत्र पठाएका छौ । पुल्चोक इन्जिनियर क्यम्पसले मसिनको सप्टवेयर ठिक छ भनेर पत्र पठाएको छ । एमालेको बादरे प्रवित्तिले आफुपनि डुब्यो हामीलाई पनि डुबायो , एमाले देशको दोस्रो ठूलो दल मात्र होइन सरकारमा भएको ठूलो घटक पनि हो । त्यसका नेताहरु को प्रवृति देख्दा लाग्यो नेताहरु जनता संग ठिक्कका कुरा गर्ने तर भनेको आफ्ना भाइ भतिजा र पिएको मात्र मान्दा रहेछन् । त्यहि कुरा माधव नेपाल बाट भयो । एमालेले पैसा दिएन भने अदालत जान्छौ हामीले त एमालेको महाधिवेशनको निर्वाचन सम्म गरेपछि सबैमा विश्वास बढ्छ । हामीहरुको पनि बजार बन्छ भनेर फाइदाको कुरै गरेका थिएनौ । तर अहिले मसिन पनि प्रयोग भएन । हामीहरुलाई आर्थिक क्षतिपनि ठूलो भएको छ । एक मसिन बनाउन कम्तीमा एक लाख सकिएको छ । त्यहि हिसाबमा कुरा गर्दा पनि सत्तरी लाख हुन आउछ । हाम्रो अन्य खर्च पनि भएको छ । त्यो सबै जोड्दा लगभग असि लाख खर्च भएको छ । त्यो नेकपा एमालेले दिनु पर्छ ।
दिएन भने अदालत जान्छौ। अदालतमा तीन वटा मुद्धा हाल्छौ । १. पहिलो हामीलाई आर्थिक क्षति भएको छ ,त्यसको भर्पाइको लागि मुद्धा हाल्छौ । २. हाम्रो गुडविलको क्षति भएको छ,त्यसको लागि मुद्धा हाल्छौ । ३. हामीलाई एभरेष्ट होटलमा बोलाएर जुन बेइज्जत गरे त्यसको पनि मुद्धा हाल्छौ । पाँच घण्टा सम्म एभरेष्ट होटलमा बसेर एक पटक पनि हाम्रो मसिन छोएनन् । तर रिपोर्ट तिनीहरुले नै बनाए छन् । मसिन नछोएर बनाएको रिपोर्ट हो । हाम्रो मसिनको आठ मेघा बाइट छ । तर उनीहरुले रिपोर्टमा सात मेघा बाइटको छ भनेर भने । सात मेघा बाइट कुनै पनि बेला फेल हुन सक्छ भनेर पत्रकारलाई रघुजी पन्तले भनेको कुरा मिडियामा आयो । यीनीहरुको दिमाग नै अकुपाई रहेछ । नेपाली प्रविधि र प्रतिभा एमालेको गुटबन्दीको सिकार भएको छ । हामी मात्र होइन त्यहाँ हाइटेक बनाउन धरैले काम गरेका थिए । ती सबै अविश्वासको शिकार भएका हुन् । एमाले भनेको कालो पत्थर हो हामी साना भङ्गेरा हौ । हामी उनी संग लडेर भिडेर त लिन सक्दैनौ । हाम्रो अबको बाटो भनेको अदालत हो । समाचार आएको छ एक जना नेताले माफि मागे भनेर तर उनीहरुले माफि माग्न लाएको काम नै गरेका होइनन् । यो त अक्षम अपराध गरेका हुन् । यीनीहरुत आफुबाहेक अरु कसैलाई हेर्दा रहेछन् । यी नेताले त आफुलाई फाइदा हुन्छ भने देशपनि बेच्न समय लगाउदैनन् । एउटा भनाइ छ नपढेको मुर्ख भन्दा पढेको मान्छे बढी मुर्ख हुन्छ । बाई सय भोट गन्न सात दिन लगाए । कार्यकर्ताका बारेमा सोच्ने फुर्सद थिएन । केवल आफु जित्छौ कि जित्दैनौ । हाम्रा तीन वटा मसिन त अहिले पनि एमालेको पार्टी कार्यलय बल्खुमा नै छन् । ती मसिनबाट झलनाथ खनाल देखि अन्य कयौ कार्यकर्ताले भोट हाल्न सिके । मिडिया बोलाए फोटा खिचाए । पत्रपत्रिकामा छपाए । तर अन्त्यमा प्रविधि देखि नै डराए । हामीलाई नत केपि ओली जिताउदा फाइदा थियो । नत माधव नेपाल जिताउदा फाइदा । दुबै एमालेका नेता हुन् । तर आधिको मनमा चिसो पसेको भनेको संसदिय दलको नेताको निर्वाचनमा केपि ओली जिते । कास्कीको जिल्ला अधिवेशनमा पनि ओली प्यानलले जितेका रहेछन् । त्यहि भएर हो जस्तो लाग्छ अर्को पक्षले प्रविधि माथि नै शंका गरेका ।
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डील्लीराम भण्डारी"यात्री"
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दारेचोक, (चितवन)- तपाईंले पिसाब फेरेबापत कहिल्यै पैसा पाउनुभएको छ? बरु २ देखि ५ रुपैयाँसम्म तिर्नुभएको पो होला। तर, पृथ्वी राजमार्ग छेवैमा चितवन, दारेचोक–७ पुग्नुभयो भने तपाईंले पिसाब फेरिदिएबापत उल्टै एक रुपैयाँ पाउनुहुनेछ। स्थानीय श्रीरेन्द्रप्रकाश पोखरेल आफ्नो चर्पीमा पिसाब फेरिदिनेलाई विगत ६ वर्षदेखि पैसा दिइरहेका छन्।
यसरी संकलित पिसाब मलका रूपमा बिक्री गरेर उनी पनि पैसा कमाउँछन्। नबिकेको पिसाब आफ्नै करेसाबारीको तरकारी खेतीमा प्रयोग गरेर पोटाँस, युरियाजस्ता मलमा खर्च हुने पैसा जोगाउँछन्।
पिसाब संकलनका लागि उनको घर, कार्यालयमा मात्रै होइन, अहिले गाउँभरि नै आधुनिक प्रविधिका चर्पी छन्। यस्तो प्रविधिलाई 'इकोसान' भनिन्छ। अनि यो प्रविधिका स्थानीय अगुवा उनै ५० वर्षीय पोखरेल हुन्। दारेचोक–५ को माझागाउँ माविका प्रधानाध्यापक उनले २०६४ सालमा नेपाल सरकारले प्रअहरूलाई दिएको सरसफाइसम्बन्धी तालिमबाट यो प्रविधि सिकेका थिए। 'तालिममा ४५ मिनेट सरसफाइ, खुला दिसामुक्तिका फाइदाबारे सिकाइएको थियो। त्यही बेला इन्जिनियर नवलकिशोर मिश्रले सिकाएको प्रविधि मैले प्रयोगमा उतारेको हुँ,' पोखरेलले भने।
दिसापिसाब जम्मा हुने गरी अन्य स्थानका भन्दा फरकखाले प्यान प्रयोग गरिएका छन्, त्यहाँका चर्पीमा। दिसापिसाब छुट्टाछुट्टै ठाउँमा जम्मा हुन्छ। 'तरकारी, फलफूलका लागि चाहिने पोटाँस, युरिया, फस्फोरसको काम युरिनले गर्छ,' पोखरेलले भने, 'मानिसको पिसाबमा युरिनको मात्रा सबैभन्दा धेरै हुन्छ। यसले रासायनिक मलको तुलनामा कयौं गुणा बढी काम गर्छ।' पिसाब संकलनका लागि फरक–फरक प्यान भएको चर्पी पोखरेलको सेवा नेपाल कार्यालयमा छ। यसरी संकलित पिसाब तीन सातासम्म बन्द भाँडोमा राख्ने र त्यसपछि प्रयोग गरिने उनले जानकारी दिए।
२०६५ सालतिर अभियान सुरु गर्दा उनलाई स्थानीयले साथ दिएका थिएनन्। सुरुमा उनले विद्यालयवरपरका पाँच घरधुरीलाई पिसाबको फाइदाबारे बुझाए। संकलन तरिका सिकाएर आवश्यक चर्पी निर्माणमा सघाए। अहिले उनको टोल र वडा मात्रै होइन, दारेचोक गाविसका १६ सयमध्ये ७ सय घरमा पिसाब संकलन गर्न मिल्ने चर्पी छ। अभियान सुरु गर्नुअघि बनेका पक्की घरमा पनि शौचालयमा जर्किन, ड्रम राखेर सोलीमार्फत पिसाब संकलन गरिँदै आएको छ। रासायनिकभन्दा यसखाले मलले तरकारी तथा फलफूल खेती सप्रिएपछि किसान उत्साहित भएका हुन्। पोखरेल भन्छन्, 'पहिले त श्रीमतीले नै साथ दिन्नथी। एक्लै थिएँ। अहिले त जम्मा भएको पिसाब कसैलाई बाँडे उल्टै गाली गर्छे।'
गाविसमा इकोसान अभियान विस्तारका लागि पोखरेलले २०६७ देखि तीन वर्ष बेतलबी बिदै लिएका थिए। सरकारी सेवाबापत पाउने सबैखाले बिदा पिसाब संकलन अभियान प्रवर्द्धन गर्दैमा सके। बिदापछि जागिरमा फर्किएको केही समयमै उनको पेन्सन भयो। अहिले पूरै समय इकोसान प्रविधिलाई देशव्यापी बनाउने अभियानमा जुटेका छन्। 'अवकाशपछिको जीवनमा मेरो उद्देश्य भनेकै देशभरिका किसानलाई यो प्रविधि सिकाउनु हो,' पोखरेल भन्छन्, 'अहिले विस्तारै माग बढेको छ, तालिम दिनुपर्यो भन्ने धेरै छन्।'
केही वर्षअघि उनी पृथ्वी राजमार्गछेवैमा शौचालय बनाएर यात्रुको पिसाब संकलन गर्थे। तर, सडक विस्तारका क्रममा शौचालय भत्किएको थियो। अहिले उनी नयाँ योजनासाथ राजमार्गछेउमै पिसाब संकलन केन्द्र बनाउने योजनामा छन्। इकोसान प्रविधिबारे सर्वसाधारणलाई प्रशिक्षण तथा परामर्श दिन 'द सेवा नेपाल' नामक संस्था खोलेका छन्। जहाँ बोर्ड टाँगिएका छन्– 'पिसाब फेर्नुस्, एक रुपैयाँ लैजानुस्।' त्यहाँ पुग्न हाइवेबाट एक किलोमिटर हिँड्नुपर्छ।
इकोसान प्रविधिको प्रवर्द्धनबापत पोखरेल वातावरणीय क्षेत्रका विभिन्न संघसंस्थाबाट सम्मानित समेत भइसकेका छन्। अहिले उनको गाउँमा छिमेकीहरूबीच पिसाबको पैँचो चल्छ। एउटाको घरमा जम्मा भएको पिसाब आवश्यक परेका बेला छिमेकीलाई दिने र पछि सापटी तिर्ने चलन छ। पोखरेल भन्छन्, 'पिसाब फेर्नेलाई एक रुपैयाँ दिँदा नाफा छैन तर अभियानलाई निरन्तरता दिन र प्रविधिको महत्व बुझाउन यसो गरेको हुँ।'
source: http://nagariknews.com/society/nation/story
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डील्लीराम भण्डारी"यात्री"
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तेरिया फौजा मगर, भारतीय टेलिभिजन ‘जीटिभी’बाट प्रशारण भएको रियालिटी शो ‘डान्स इन्डिया डान्स लिटिल मास्टर सिजन थ्री’ विजेता । रुपन्देहीकी १२ वर्षीया तेरियाले छनोट भएका ४० हजार प्रतिस्पर्धीलाई पछि पार्दै विजेता बनेकी हुन् ।
तेरिया मगर
१. डीआइडी लिटिल मास्टर सिजन थ्रीको उपाधि जितेपछि अहिले कस्तो महशुस भइरहेको छ ?
पहिला त सम्पूर्ण नेपाली आमा बुवा दिदीबहिनी तथा दाजुभाइलाई मेरो नमस्कार । म तपाइँहरु सबैलाई धेरै–धेरै धन्यवाद दिन चाहन्छु । मेरो ट्यालेन्ट र तपाइँहरुको महत्वपूर्ण भोटको सहयोगले नै म डीआइडी लिटिल मास्टर सिजन थ्रीको विजेता बन्न सफल भएँ ।
म तपाइँहरुको जीवनभरि नै आभारी रहनेछु । मलाई यसरी नै सधैं सहयोग गरिरहनुहोला । तपाइँहरुको सहयोग, साथ र माया पाइरहेमा एक न एक दिन म नेपालको नाम विश्वमा चम्काउने छु ।
डीआइडी लिटिल मास्टरको उपाधि जितेपछि आफूलाई अत्यन्तै भाग्यमानी ठानेकी छु । जतिबेला यो प्रतियोगितामा सहभागी भएको थिए, त्यतिबेलादेखि नै उपाधि जितौँ र आमाबुवा अनि देशको नाम विश्वमा चिनाउँ भन्ने लागेको थियो । त्यो सपना पूरा भएको छ । अत्यन्तै खुशी लागेको छ ।
२. डीआइडी लिटिल मास्टरको उपाधि जितेर आएपछि तपाइँलाई नेपालका विभिन्न जिल्लाहरुमा अभिनन्दन भइरहेको छ । यो सम्मानलाई कसरी लिनुहुन्छ ?
मलाई सबै नेपालीहरुले उपाधि जित्नुअघि जति सहयोग र माया गर्नु भएको थियो, उपाधि जितेपछि पनि त्यति नै माया गर्नुभएको छ । जसले गर्दा विभिन्न जिल्लाबाट सम्मानित भइरहेकी छु । यसबाट मलाई अगाडि बढ्न एकदमै हौसला मिलेको छ ।
३. डीआइडी लिटिल मास्टरमा कसरी सहभागी हुन पुग्नुभयो ?
सानै उमेरदेखि नाच्न भनेपछि म खुब मन पराउँथे । मैले नर्सरी कक्षामा पढ्दादेखि नै नृत्य प्रतियोगितामा सहभागिता जनाउन थालेकी थिए । नर्सरी कक्षामा पढ्दा सानै भएपनि नृत्य प्रतियोगितामा उपाधि जित्नेक्रम त्यहीबाट सुरु भएको थियो ।
मैले थाहा पाएसम्म कुनैपनि नृत्य प्रतियोगिताहरु मैले छुटाएको छैन । नृत्यका लागि मेरो प्रयास भइरहन्थ्यो । मैले कहिले पनि दोस्रो हुनु परेन । डीआइडी लिटिल मास्टर सिजन टु म एकदमै हेरिरहन्थे । पछि सिजन थ्री आयो । टिभीमा सिजन थ्रीका लागि जयपुर, मुम्बई, दिल्ली लगायतका ठाउँमा अडिसन हुँदैछ भने थाहा पाएँ ।
मैलै धेरै नृत्य प्रतियोगिताहरु जितेको हुनाले डीआइडीमा सहभागी हुने हौसला मिलेको थियो । त्यसपछि मैले मेरो ममीलाई भने–एक पटक प्रयास गर्दैमा के नै हुन्छ र ? त्यसपछि घरमा सल्लाह भयो ।
अनि, हामी अडिसन दिन मुम्बई गयौँ । नेपालीले अडिसन दिन पाइन्छ की पाइन्न भनेर कुराकानी भयो । जीटिभिले नेपालबाट पनि भाग लिन पाइने तर छनोट नभए त्यसै फर्काउन गाह्रो हुने बताउँदै बरु त्यसको साटो हिन्दी गीतमा नाचेको भिडियो पठाउन भन्यो । हामीले पनि भिडियो पठायौँ, त्यसलाई जीटिभीले स्वीकार ग¥यो । त्यसपछि नै मेरो नृत्यको सफर सुरु भयो ।
४. तपाइँलाई प्रतियोगितामा सहभागी हुने क्रममा भारत लैजानेदेखि अन्य काममा क–कसको सहयोग रह्यो ?
मेरो ममीले एकदमै धेरै सहयोग गर्नुभयो । पहिलो अडिसन र मेघा अडिसनमा भने मसँग बाजे हुनुहुन्थ्यो । त्यसपछि भने ममी नै मेरो साथमा हुनुहुन्थ्यो ।
५. डीआइडी लिटिल मास्टर्सका जजहरुको प्रतिक्रिया तपाइँप्रति कस्तो रहन्थ्यो ?
मेरो पहिलो शो नै राम्रो भएकाले उहाँहरुले ‘नाइस् एक्ट’ भनेर प्रसंशा गर्नु भएको थियो । त्यसमा पनि मलाई अघिल्लो लिटिल मास्टर्सकी प्रतिस्पर्धी सोम्या राई जस्तै भनेर उहाँहरुले भन्ने गर्नुहुन्थ्यो । निर्णायक मण्डलका एक सरले मेरो नृत्य सहकर्मी गौरभ र मेरो युगल नृत्य हेरेपछि, गौरभ तिमीले बलिउड नृत्य एकदमै राम्रो गर्छौँ । तर, आज तिमीलाई तेरियाले टक्कर दिइन् भनेर मेरो पहिलो शोमा नै प्रसंशा गर्नुभएको थियो । जसबाट म अत्यन्तै खुशी भएकी थिए ।
६. तपाइँले मुम्बईमा रहेर नृत्य गर्ने क्रममा धेरै कुराहरु सिक्न अवसर पाउनुभयो । सिक्ने–सिकाउने कुरामा नेपाल र त्यहाँ के–कति फरक रहेछ ?
नेपालमा हुँदा म दिनमा एक घन्टा जति नृत्य सिक्थें । यहाँ नृत्य सिक्दा दिनमा एउटा एउटा मात्रै स्टेप सिकेर घर गइन्थ्यो । तर, मुम्बईमा बिहान सात बजेदेखि १२/४ बजेसम्ममा एकै दिन लगाएर एउटा सिंगै गीत सिध्याउन लगाइन्थ्यो । यहाँ र त्यहाँमा सिकाउने कुरामा धेरै फरक छ । जसले गर्दा मैले धेरै कुराहरु सिक्न पाएको छु । फेरि मुम्बईमा ६ महिना जति बसेकाले अहिले मेरो बोलीको लवज पनि हिन्दी जस्तै भएको छ । तर......जे गर जसो गर, जतासुकै लैजाऊ मलाई, यो मन त नेपाली हो....!
काठमाडौं विमानस्थलमा तेरिया फौजा ।
डान्स इन्डिया डान्स (डिआइडी) प्रतियोगिताका लागि चार महिनादेखि भारतको मुम्बईमा रहेकी तेरिया अन्तिम पाँचमा छनोट हुने निश्चित भएपछि रूपन्देहीमा नृत्य छायांकनका लागि जीटीभीको टोलीसहित आएकी छन् ।
काठमाडौं विमानस्थलमा तेरिया फौजा ।
तेरियाले नेपालमा रहँदा नृत्य प्रस्तुत गर्ने र आफूलाई भोट दिन आग्रह गर्ने कार्यक्रम छ। १४ वर्ष उमेरसम्मका ४० हजार प्रतिस्पर्धीलाई उछिन्दै उनी भोटिङ उत्कृष्ट १० मा पुगेकी थिइन्।
काठमाडौं विमानस्थलमा तेरिया फौजा ।
आकर्षक नृत्य कलाका कारण निर्णायकको मन जितेकी उनले दर्शकबाट पनि सर्वाधिक भोट पाइरहेकी छन् । प्रतियोगिताको अन्तिम पाँचजनामा छनोट हुने तेरिया पहिलो नेपाली र कम उमेरकी प्रतियोगी हुन्।
काठमाडौं विमानस्थलमा तेरिया फौजा ।
मुम्बईबाट काठमाडौं हुँदै भैरहवा आइपुगेकी तेरियाको टोलीलाई गौतमबुद्ध विमानस्थलमा विभिन्न संघसंस्था र तेरियाका आफन्तले भव्य स्वागत गरेका छन् ।
भैरहवा विमानस्थलमा तेरिया ।
भैरहवा हुँदै बुटवल र उनको जन्म गाउँ रुद्रपुर पुग्दासम्म उनको स्वागतमा हुने सबै गतिविधिको जिटिभीले छायांकन र प्रसारण गर्ने भएको छ ।
भैरहवा विमानस्थलमा तेरिया ।
बागेश्वरी संगीतालय बुटवलकी प्रशिक्षार्थी तेरिया रुद्रपुरस्थित विद्यालयमा कक्षा ५ मा अध्ययनरत छिन्। तेरियाले गत वर्ष काठमाडौंमा सम्पन्न राष्ट्रव्यापी नृत्य प्रतियोगितामा प्रथम भएकी थिइन् ।
भैरहवा विमानस्थलमा तेरिया ।
डीआईडी लिटिल मास्टर्सको उपाधि विजेताले ५० लाख भारु नगद र कारलगायतका उपहार प्राप्त गर्नेछन्।
७. मुम्बईमा नृत्य सिक्ने क्रममा तपाइँलाई सिकाउनु हुने गुरुहरुको बानी–व्यवहार कस्तो पाउनुभयोे ?
उहाँहरुले हामीलाई कहिले पनि भेदभाव गर्नु भएन । उहाँहरुले अरु साथीहरु समान मलाई पनि माया गर्नुभयो । माया गरेर सिकाउनु हुन्थ्यो । राम्रो नृत्य गरेको खण्डमा उहाँहरुले गिफ्ट दिने गर्नुहुन्थ्यो । चक्लेटहरु दिने गर्नुहुन्थ्यो ।
८. मुम्बई लामो समयसम्म बस्दा कहिलेकाँही घरको याद आउँदैनथ्यो ?
पहिला–पहिला निक्कै अफ्ट्यारो महशुस हुन्थ्यो । त्यसमा पनि कहिले हिन्दी नबोलेको भाषाको समस्याले झन् गाह्रो भएको थियो । जसले गर्दा कहिलेकाही बोल्ने क्रममा नेपाली शब्द नै मुखबाट निस्कन्थ्यो । बिस्तारै हिन्दी बोल्न थालेपछि सजिलो हुँदै गयो । सुरुको अढाई महिना जति मेरो साथमा ममी हुनुहुन्नथ्यो । त्यसबेला बाजे हुनुहुन्थ्यो । ममी नभएकाले सुरुको महिनामा कसैसँग बोल्न पनि मन लाग्दैनथ्यो । खाली ममीको याद मात्रै आउने, फोनमा ममीसँग कुरा गर्दै रुने गर्थे । जसका कारण मेरो नृत्य पनि राम्रो हुन्दैनथ्यो । तर, पछि ममी आउनुभयो, खुशी लाग्यो ।
९. प्रतिस्पर्धी साथीमध्ये तपाइँको मिल्ने साथी को थियो ?
मेरा दुई बेस्ट फ्रेन्ड थिए । अनुष्का र राजीव ।
१०. फाइनलमा उनै अनुष्कालाई नै पछि पार्दै तपाइँले उपाधि जित्नुभयो, कस्तो लागेको थियो त्यतिबेला ?
मलाई एकदमै खुशी लागेको थियो । खुशी व्यक्त गर्ने शब्द नै छैन । फाइनल राउन्डमा परेदेखि नै मलाई जित्छु जस्तो लागेको थियो । जब विजेताको नाम घोषणा भयो, त्यतिबेला मलाई ठूलै झड्का महशुस भयो । र, मेरो एउटा सपना पनि पूरा भयो । मेरो देश र परिवारको नाम चम्काउन पाएँ ।
११. तपाइँ फाइनल राउन्डमा नाचिरहेको अवस्थामा एउटा बाकसमा तपाइँका लागि गिफ्ट आएको थियो । त्यसभित्रबाट तपाइँको बाबा बाहिर निस्कनुभएको थियो । त्यो भन्दा अगाडि तपाइँलाई आफ्नो बाबा आउनुभएको छ भनेर थाहा थियो ?
नाई, मलाई कसैले पनि भन्नुभएको थिएन । मलाई शंका चाँही लागेको थियो । तर, मैले त्यहाँ खोज्दा खेरी भेट्टाइन, त्यसपछि मेरो आशा नै हराइसकेको थियो । जब मैले मेरो बाबालाई एक्कासी मेरो अगाडि पाएँ, त्यतिबेला विजेता बनेको भन्दा पनि धेरै खुशी लागेको थियो ।
१२. डीआइडी शोका क्रममा ग्रान्ड मास्टरका रुपमा रहेका ‘मिथुन दादा’मा तपाइँले के पाउनुभयो, उहाँ कस्तो व्यक्ति हुनुहुँदोरहेछ ?
ग्रान्ड मास्टरले मलाई एकदमै माया गर्नुहुन्थ्यो । मलाई नेपालकी रानी भन्नुहुन्थ्यो । ‘मेरो एउटा फेब्रेट कन्टेस्टेन्ड हो, गर्लफ्रेन्ड हो’ भन्नुहुन्थ्यो । मैले उहाँको एकदमै माया पाएँ । विश्रामको समयमा हामी उहाँसँग कुराकानी गथ्र्याँ ।
यसक्रममा एक पटक ग्रान्ड मास्टरले नेपालीमै भन्नुभएको थियो– ‘नेपालका दाजुभाइ, दिदीबहिनी, आमाबुबा सबैलाई मेरा तर्फबाट हाई ! नमस्कार भनी देऊ है ।’ त्यसपछि म तुरुन्तै नेपाल आउन पाइँन र भन्न पाएको थिइन तर आज तपाइँले ठ्याक्कै सम्झाइ दिनुभयो, भन्न पाएँ ।
१३. अब तपाइँ नेपालमै बसेर अगाडि बढ्नुहुन्छ की मुम्बई जानुहुन्छ ?
राम्रो कोरियोग्राफर हुने मेरो एउटा सोंच छ । त्यसैले मेरो करियर जहाँ राम्रो हुन्छ म त्यही बस्छु । यदि नेपालमा राम्रो भएन भने म मुम्बई गएर सिकेर फेरि नेपालमै आउने छु । र, सिकेको कुरा नेपालमा सिकाउन चाहन्छु । साथै नयाँ–नयाँ डान्स फर्महरुको निर्माण गर्न चाहन्छु । भारतको नृत्यको जुन उचाई छ त्यही लेभलमा नेपालको नृत्यलाई पनि पुर्याउन प्रयास गर्नेछु ।
१४. तपाइँले डीआइडी लिटिल मास्टर्स सिजन थ्रीको उपाधिसँगै जित्नुभएको नगद पुरस्कारका बारेमा विभिन्न खाले कुरा आएका छन् । कतिले ५० लाख भारु र एउटा कार जितेको भन्छन्, कतिले दश लाख भारु भन्छन् कुन चाँही सही हो ?
यस्तो हल्लाबारे मलाई थाहा थिएन । मैले जितेको नगद दश लाख भारु र केबी थ्री कप मात्रै हो । ५० लाख भारु भनेको ‘नचबलिए’ जस्ता ठूला नृत्य प्रतियोगिताको पुरस्कार हो भने कार चाँही डीआइडीको ठूलाहरुको नृत्य प्रतियोगिताको पुरस्कार हो ।
१५. विजेता भएर आएदेखि पछिल्लो समय तपाइँ सम्मान कार्यक्रमहरुमा व्यस्त हुनुहुन्छ, यो क्रम अझै केही समयसम्म चलिरह्यो भने तपाइँको पढाईलाई असर गर्दैन ?
नेपाली दाजुभाइ, दिदीबहिनी तथा बुबाआमाको भोटिङको सहयोगले नै मैले उपाधि जित्न सफल भएकी हुँ । त्यसैले अहिले मैले उहाँहरुको सम्मानका लागि समय दिनै पर्छ । म मेरो पढाई छाड्ने छैन, चाँडै स्कूल जान थाल्ने छु ।
१६. अन्त्यमा तपाइँका सुभचिन्तकहरुलाई केही भन्न चाहनुहुन्छ ?
म तीनओटा कुरा भन्न चाहन्छु । पहिला त मलाई तपाइँहरुले साथ दिनुभएकोमा धेरै–धेरै धन्यवाद । मलाई सधैँ यसरी नै सहयोग गरिरहनुहोला । दोस्रो, जसरी मेरो ममीले मेरो इच्छा बुझेर मलाई नृत्य सिक्ने अवसर दिनुभयो, त्यसरी नै तपाइँहरुले पनि आफ्नो छोराछोरीको इच्छा बुझ्ने कोशिस गर्नुस् । र, मात्रै छोराछोरीको भविष्य बनाउने सोच बनाउनुस् । तेस्रो, जुन कुनै प्रतियोगितामा सहभागिता जनाउने प्रयास गर्नुस्, सोनो होस् वा ठूलो । सानोबाट नै ठूलो ठूलो हुँदै जाने भएकाले तपाइँले प्रयास गर्दै जानुभयो भने एक न एक दिन तपाइँलाई सफलता मिल्ने छ ।
प्रस्तुतिः कमल राना । तस्वीर: बबिता बुढाथोकी /ऋषिराम कट्टेल
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डील्लीराम भण्डारी"यात्री"
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नेपाली कांग्रेसका सभासद् तथा युवा नेता गगन थापाले व्यवस्थापिका संसदको सभामुख र संविधानसभाको अध्यक्ष फरक–फरक हुनुपर्ने बताएका छन् । एउटै व्यक्ति सभामुख र संविधानसभाको अध्यक्ष रहँदा संसदको कामले संविधानसभाको कामलाई प्रभावित गर्ने बताउँदै थापाले सो कुरा बताएका हुन् । रातोपाटीसँग विशेष कुराकानी गर्दै थापाले भने, ‘पहिलो संविधानसभामा विशेष परिस्थितिमा दुई वर्षको अन्तरिमकालका लागि संविधानसभाले नै व्यवस्थापिका संसदको काम गर्ने भनिएको हुँदा त्यस्तो प्रावधान राखिएको थियो । तर हामीले देख्यौं संसदको कामले संविधानसभाको कामलाई पूर्ण रुपमा प्रभावित गर्यो । त्यसैले सभामुख छुट्टै र संविधानसभाको अध्यक्ष छुट्टै बनाउनुपर्छ ।’ यसरी छुट्टै व्यक्तिलाई जिम्मेवारी दिँदा संविधानसभामा पक्ष र प्रतिपक्ष भन्ने कुरा पनि नरहने उनको तर्क छ । ‘सरकार बनाउँदा सभामुख भागबण्डा गरे पनि सरकारमा नरहेको दललाई अध्यक्षको जिम्मेवारी दिनुपर्छ । जसले संविधानसभामा पक्ष प्रतिपक्ष भन्ने रहँदैन । यसले सरकारको दिनहुँको कामलाई प्रभावित पनि गर्दैन,’ उनले भने । थापाका अनुसार एक वर्ष भित्र संविधान जारी गर्ने हो भने दलहरुले आफ्नो कार्यशैली परिवर्तन गर्नुपर्ने बताए । पूरानै शैलीमा काम गरेर परिणाम नयाँ खोज्नु चमत्कारमा विश्वास गर्नुजस्तै हो भन्ने धारणा रहेको छ । ‘ हामीले काम गर्ने तरिका नफेरी जस्ताको तस्तै पुरानो शैलीमा काम गरेर परिणाम नयाँ आउँछ भन्यौं भने त्यो जादुमा विश्वास गर्नु जस्तै हुनेछ । यही तरिकाले काम गर्यौं भने अघिल्लो पटक जस्तै यसपटक पनि परिणाम असफलता नै हुनेछ ।’ समयमा संविधान लेख्नका लागि दलहरुले एक पछि अर्को काम नगर्दै एकसाथ चार–पाँचवटा काम सँगै लैजानु पर्ने उनको धारणा थियो । उनले भने, ‘हाम्रो कार्यतालिका निकै व्यस्त हुनुपर्छ । त्यसका लागि एकपछि अर्को काम गर्ने भनेर हुँदैन । यसका लागि सँगसँगै चार–पाँच वटा कामहरु सँगसँगै लानुपर्दछ । सरकार र संविधान निर्माणको कामलाई अलग्गै लानुपर्छ ।’ फरक प्रसंगमा थापाले संविधानसभामा बाहिरी हस्तक्षेप कम गर्न दातृ निकाय र अन्तर्राष्ट्रिय समुदायबाट सहयोग लिने काम पनि बन्द गर्नुपर्ने बताएका छन् । उनका अनुसार दातृ निकायबाट सहयोग लिँदा संविधान लेखनमा हस्तक्षेप हुन्छ । ‘ हामीले बदल्नुपर्ने अर्को काम भनेको बाहिरबाट सहयोग लिने कामलाई बन्द गर्नुपर्छ । यसरी सानो विषयमा सहयोग लिँदा उनीहरुको चाँसो अनुसार काम गर्नु पर्ने हुन्छ,’ उनी भन्छन् । - सशक्त युवा नेताको रुपमा आम नेपालीबीच परिचित गगन थापा यसपटकको संविधानसभामा नेपाली कांग्रेसका तर्फबाट सभासद्मा निर्वाचित भएका छन् । स्पष्ट वक्ताका रुपमा पनि चिनिने थापा, दलहरुले एक वर्षभित्र संविधान बनाउने हो भने सबैभन्दा पहिले आफ्नो कार्यशैली परिवर्तन गर्नुपर्ने विचार राख्दछन् । संविधानसभामा हरेक विषयलाई छलफल गरेर मात्र अनुमोदन गर्नुपर्ने उनको उडान रहेको छ । तीन महिना बितिसक्दा पनि संविधान लेखनमा प्रगति नभएको र अझै पहिलेकै गल्तीलाई दलहरुले दोहोर्याई रहेको सेरोफेरोमा कांग्रेस सभासद् गगन थापासँग गरेको कुराकानीको सम्पादीत अंशः संविधानसभाको निर्वाचन भएको तीन महिना बितिसक्दा पनि संविधान निर्माणको विषयमा उल्लेखिय प्रगति हुनसकेको छैन । किन ? संविधानसभाको निर्वाचन पश्चात बितेको तीन महिनामा जुन अलमल देखिएको छ, त्यसले पक्कै पनि अनिश्चिताको संकेत गरेको छ । यसरी अलमल हुनुको पछाडि मुख्य तीन कारणहरु रहेका छन् । पहिले त हाम्रो अन्तरिम संविधानमा केही कमजोरी र अस्पष्टता रह्यो जसले यो अन्यौलतालाई थप बढावा दियो । जस्तै सरकार गठन कसरी गर्ने ? कसले बैठक बलाउने ? आदि विषयहरुले अनावश्यक रुपमा उल्झनहरु बढाउने काम गर्यो । दोस्रो, केही राजनीतिक कारणहरु पनि रहे । जस्तै एकीकृत नेकपा माओवादीले निर्वाचनको परिणाम अस्वीकार गरेको अवस्था थियो । उसलाई मनाएर संविधान निर्माणको प्रक्रियामा ल्याउन पनि केही समय खर्च भयो । तेस्रो भनेको हाम्रो काम गर्ने शैली नै रह्यो । जुन स्थायी प्रवृति हामीले पहिलो संविधानसभामा देखेका थियौं । अहिले ठ्याक्कै त्यही प्रवृतिको पुनरावृत्ति भएको छ । समानुपातिक सभासद् चयनदेखि लिएर अहिले सरकार गठनको प्रक्रियासम्म हेर्ने हो भने ठ्याक्कै त्यही देखिन्छ । हामीले सरकार निर्माणको प्रक्रियासँगै संविधानसभाको कामलाई सँगै लिएर जान सक्थ्यौं । तर हामीले त्यसो गर्न सकेनौं । हामीमा प्रक्रिया, विधि र विधानमा विश्वस नगर्ने र मौका मिले आफू अनुकुल प्रक्रियालाई मिच्ने प्रवृति रहेको छ । हामी परिणाम चहान्छौं तर त्यो परिणाम हासिल गर्न समयबद्ध तरिकाले काम गर्न चाहँदैनौं र अन्तिम समयमा चमत्कारमा विश्वास गर्छौं । यो चरम भाग्वादी चिन्तन हामीमा हावी छ । त्यही भएर चाहना हुँदा हुँदै पनि हामीले काम गर्न सकिरहेका छैनौं । यसलाई कसरी चिर्ने त ? संविधान निर्माण तथा सरकार निर्माणको क्रममा राजनीतिक समस्याहरु आइरहन्छन् । त्यो कुनै नौलो होइन । तर त्यसलाई कसरी हल गर्ने विधि र संयन्त्रको निर्माण गर्न जरुरी छ । यहाँ हामीले सुधार्नु पर्ने सबैभन्दा महत्वपूर्ण कुरा भनेको हाम्रो काम गर्ने शैली नै हो । हामीले काम गर्ने तरिका नफेरी जस्ताको तस्तै पुरानो शैलीमा काम गरेर परिणाम नयाँ आउँछ भन्यौं भने त्यो जादुमा विश्वास गर्नु जस्तै हुनेछ । यही तरिकाले काम गर्यौं भने अघिल्लो पटक जस्तै यसपटक पनि परिणाम असफलता नै हुनेछ । नयाँ तरिकाले काम गर्ने भनेको कसरी ? नयाँ तरिकाले काम कसरी गर्ने भन्ने विषयमा मेरो तीन वटा सोँच रहेको छ । अहिले पहिलो संविधान सभाले गरेको कामलाई के गर्ने विषयमा ठूलो अन्यौलता रहेको छ । हुन न पनि यो नयाँ संविधानसभा हो, पुरानो होइन । यो संविधानसभासँग सार्वभौम अधिकार छ, यसले कुनै विषयलाई लिन पनि सक्छ र नलिन पनि सक्छ । यसमा कुनै सन्देह छैन । तर जति यो कुरा सत्य छ, यो पनि सत्य हो कि यो संविधानसभा शुन्यबाट आएको होइन । यो जनआन्दोनको पृष्ठभूमिमा विभिन्न विद्रोह र आन्दोलनको जगमा आएको पहिलो संविधानसभा असफल भएपछि त्यही संविधानसभाले गर्न नसकेको काम पूरा गर्न आएको हो । त्यसैले यो समस्या हल गर्नका लागि सजिलो विधि भनेको ठूला दलहरुले सामुहिक रुपमा यस संविधानसभामा विघटित संविधानसभामा भएका सहमतिहरु माथि छलफल होस् भन्ने प्रस्ताव लिएर आउने र त्यसमा छलफल गर्ने । यसले के गर्छ भने ती अन्तरवस्तुहरुलाई पुनः एक पटक जनतासँग जोड्छ, नयाँ सभासद्हरु पनि त्यस विषयमा सूचित हुन्छन् र उनीहरुलाई पनि जोड्दछ । यसको साथै जुन दलले यसलाई मान्दैनौं भनेका छन् उनीहरु पनि यस छलफलमा भाग लिन पाउँछन् । यसका लागि दिनको ६–८ घण्टा बसेर भएर पनि १५–२० दिन भाग लिन सकिन्छ र अन्त्यमा यसलाई निर्णयार्थ प्रस्तुत गर्न सकिन्छ । यसरी दलले पक्ष र विपक्षमा मतदान गर्न पाउने छन् । आजको शक्ति सन्तुलनले के देखाउँछ भने सजिलै सँग यो विषय पारित हुन्छ । अब जसले यसको विपक्षमा भोट गरेका छन् उनीहरुले पनि निर्णयलाई मान्नुपर्ने हुन्छ किनभने यो अब यही संविधानसभाको प्रक्रिया बनिसकेको हुन्छ । यसरी नयाँ पूरानो भन्ने अन्तहिन छलफल पनि सकिन्छ । तर यसमा हामीले काम गर्ने तरिका फेर्नुपर्छ । कांग्रेस एमाले र एमाओवादीका नेताहरु भने धेरै समयदेखि यस प्रस्तावलाई ल्याउन खोजिरहनुभएको छ तर त्यो एक दिनमा ल्याएर एकै दिनमा पास गर्ने गरी । तीन महिनासम्म सुत्ने, समयको महत्व नबुझी काम नगर्ने र समय दिनुपर्ने कुरालाई समय नै नदिने र एकै दिनमा छलफल नगरी पास गराउने मुडमा वहाँहरु रहेको देखिन्छ । हामीले यहाँ नै काम गर्ने तरिका फेर्न सकिन्छ । त्यस्तै मैले देखे अनुसार संविधानसभाको अध्यक्ष र सभामुख एकै व्यक्ति हुने जुन संवैधानिक प्रावधान छ त्यसलाई बदल्नुपर्ने देखिन्छ । पहिलो संविधानसभामा विशेष परिस्थितिमा दुई वर्षको अन्तरिमकालका लागि संविधानसभाले नै व्यवस्थापिका संसदको काम गर्ने भनिएको हुँदा त्यस्तो प्रावधान राखिएको थियो । तर हामीले देख्यौं संसदको कामले संविधानसभाको कामलाई पूर्ण रुपमा प्रभावित गर्यो । त्यसैले सभामुख छुट्टै र संविधानसभाको अध्यक्ष छुट्टै बनाउनुपर्छ । सभामुख भनेको सरकार बनाउने दलहरु बीच भाग बण्डाको विषयमा पर्ने भयो र संविधानसभाको अध्यक्ष भने छुट्टै हुने भने । यसमा के हुन्छ भने जस्तै कांग्रेस एमालेको सरकार बनेको अवस्थामा एमाओवादीलाई संविधानसभाको अध्यक्षको जिम्मेवारी दिने जसले ऊ पनि संविधान निर्माणको प्रक्रियामा आउने छ । त्यस्तै अन्य दल मिलेमा सरकारमा नरहेको दललाई अध्यक्षको जिम्मेवारी दिनुपर्छ । जसले संविधानसभामा पक्ष प्रतिपक्ष भन्ने रहँदैन । यसले सरकारको दिनहुँको कामलाई प्रभावित पनि गर्दैन । हामीले बदल्नुपर्ने अर्को काम भनेको बाहिरबाट सहयोग लिने कामलाई बन्द गर्नुपर्छ । यसरी सानो विषयमा सहयोग लिँदा उनीहरुको चाँसो अनुसार काम गर्नु पर्ने हुन्छ, यसले हस्तक्षेप बढाउने काम गर्छ । संविधानसभालाई केही चाहेको खण्डमा नेपाल सरकारलाई माग्नुपर्छ । संविधानसभालाई चाहिएको कुरा पु¥याउने जिम्मा नेपाल सरकार हो । हामी सानो नियम बनाउन पनि अन्तर्राष्ट्रिय समुदाय र दातृ निकायलाई गुहार्छौं । उदाहरणको लागि हामी एउटा कम्प्युटर बनाउन पनि दातृ निकायलाई भन्छौं । हेर्दा यो सानो देखिए पनि यो विषय विस्तारै संविधानसभाभित्र पस्छ र यसले संविधान बनाउने प्रक्रियामा हस्तक्षेप गर्छ । यसलाई हामीले पहिलो संविधानसभामा राम्ररी अनुभव गरिसकेका छौं । त्यसैगरी हामीले एक वर्षमा संविधान बनाउने भने पछि हाम्रो कार्यतालिका निकै व्यस्त हुनुपर्छ । त्यसका लागि एकपछि अर्को काम गर्ने भनेर हुँदैन । यसका लागि सँगसँगै चार–पाँच वटा कामहरु सँगसँगै लानुपर्दछ । सरकार र संविधान निर्माणको कामलाई अलग्गै लानुपर्छ । जस्तै संविधानसभा भित्र हामीले अहिले सोचेको कुरा भनेको एक महिना भित्र संविधानसभाको नियम बनाउने र त्यस सँगसँगै अन्य अन्तरवस्तुमा छलफल पनि सँगै लैजाने । तर शीर्ष नेताहरु भने नियम अहिले नबनाएर एकै पटक पछि बनाउने भन्दै हुनुहुन्छ जुन गलत छ । त्यस्तै सहमति भएका विषयलाई भाषा मिलाएर ड्राफ्ट गर्दै जाने असहमतिका विषयालाई हल गर्ने कुरा पनि पार्टी गत तहमा छलफल गर्दै जाने । यसरी समानान्तर रुपमा कामलाई अघि बढायौं भने पक्कै पनि समयमा संविधान लेख्न सकिन्छ । अहिले पनि समस्या शीर्ष नेताहरुको काम गर्ने शैलीमा नै देखियो । यसलाई परिवर्तन गर्न तपाईंजस्ता युवाहरुको भूमिका के हुन्छ ? केही गरिरहनु भएको छ ? हामीले दबाब सिर्जना गर्ने कुरा गर्दा संविधानसभा भित्रैबाट दबाब सिर्जना गर्ने प्रयत्न गर्नुपर्छ । अघिल्लो संविधानसभामा हामीले कि त शीर्ष नेताहरुले काम गर्छ भन्ने विश्वासमा चुप लागेर बस्यौं कि हामीले यस प्रक्रियाबाट बाहिर रहेर दबाब सिर्जना गर्ने प्रयत्न गर्यौं । जुन सफल भएन । यस गल्तीबाट हामीले पाठ सिक्नुपर्छ । जस्तै हामीले अहिले संविधानसभाको नियम नबनाई अघि लाने कुरालाई हस्तक्षेप गरिरहेका छौं । त्यस्तै संविधान निर्माण प्रक्रियाबाट बाहिर गएको खण्डमा हामी सामुहिक रुपमा त्यसलाई हस्तक्षेप गरेर पुनः प्रक्रियामा ल्याउने प्रयत्न गर्ने छौं । त्यस्तै हामी दिनको ८ घण्टा काम गरेर भए पनि छलफल गरेर मात्र विषयहरुलाई टुंग्याउने छौं । यसका लागि हामी पार्टी भित्र र संविधानसभा नै दबाब सिर्जना गर्ने छौं । किनभने हामीले एक वर्षमा संविधान बनाउन आएका हौं । त्यही भएर हामीले हाम्रो पूरा शक्ति लगाएर दिन रात भएर पनि यस उद्देश्य पूरा गर्न लाग्ने छौं । source:-ratopati.com/2014/02/12/109986.html
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डील्लीराम भण्डारी"यात्री"
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"यहाँ कति वर्ष बिताइयो भनेर गन्न आवश्यक नै छैन किनभने पोखरा कसैलाई कहिल्यै पुग्दैन।" अंग्रेजी नयाँ वर्षको पूर्वसन्ध्यामा नदीपुर, पोखराका स्वयंशु श्रेष्ठ, २३, ले फेसबुक स्ट्याटस लेखे। हुन पनि, स्वयंशुलाई पोखरा कहिल्यै पुरानो लाग्दैन। त्यसैले त पोखरा छाड्नु नपरे हुन्थ्यो भन्ने लागिरहन्छ। न्यु इयर इभका लागि तयार भएको पोखरा, त्यसमाथि लेक साइड। फेवाताल छेवैमा 'पोखरा स्टि्रट फेस्टिभल'का लागि सजाइएको तीन किलोमिटर लामो बाटो इभको माहोलमा खचाखच छ। बिस्तारै हिँड्नेले पनि तीन किलोमिटर दूरी ३० मिनेटमा सजिलै काट्न सक्छ। तर, न्यु इयरको लेक साइड तीन किलोमिटर दूरी वा ३० मिनेटको समयले मात्र व्याख्या गर्न सक्दैन। त्यहाँ के मात्र थिएन ? पाइलैपिच्छे हिन्दुस्तानी क्लासिकदेखि पश्चिमा रकसम्मका अनेकौँ संगीत, मानिसका गालामा विभिन्न भावभंगी झल्कने फेस पेन्टिङ्। अझ सडकको ठेलमठेलबीच अलिकति अग्लिएर हेर्न खोज्ने हो भने त्यहाँ हलिउड अभिनेता विल स्मिथ, क्यानेडियन गायक जस्टिन विवर, गायिकाहरू रिहाना, माइली साइरस, फुटबलर डेबिड बेक्यामजस्ता थुप्रै सेलिब्रिटीको हेयर स्टाइलको झल्को पनि देखिन्छ। लेक साइड जति चमकदमकयुक्त र सानदार छ, उत्तिकै सरल पनि। मानिस सडकमै गीत घन्काएर डिस्कोमा जसरी नाचिरहेका छन्। हातमा बियरका बोतल लिएर हिँड्नेदेखि कतै पेटीमा बसेर 'गेट टुगेदर' गर्ने पनि उत्तिकै थिए। नेपाली जोडी कतै अँगालिएर त कतै कुना लागेर चुम्बन गर्नुसमेत दुर्लभ दृश्य लागेन। "देशमै अन्यत्र भए अस्वाभाविक लाग्ने यी दृश्य यहाँ स्वाभाविक लाग्छन्," लेखनाथका प्रगति सापकोटा भन्छन्, "तारन्तार यस्तो देखिरहँदा पोखरेलीसमेत बिस्तारै नेपाली कम, विदेशी ज्यादाजस्तो हुन पुग्छन्।" लेक साइडको माहोल स्वच्छन्द छ। सन् '६० र '७० को दशकमा काठमाडौँको झोछेँजस्तै। नहोस् पनि किन, पोखरा पनि त्यस बेला हिप्पीहरू यात्रा गर्ने दक्षिण एसियाली भूमार्गको सुन्दर गन्तव्यजस्तो न थियो। त्यसैले होला न्यु इयर र पोखरा केही वर्षयता पर्यायजस्ता बनेका छन्। तर, बर्सेनि बढिरहेको भीडले लेक साइड अब निकै साँघुरो बनिसकेको छ। जस्तो: यसपटकको न्यु इयर इभमा देखियो, लेक साइडको तीन किलोमिटर छिचोल्न घन्टौँ लाग्यो। होटल ल्यान्डमार्कका म्यानेजिङ् डाइरेक्टर ध्रुव शर्मा ठट्यउलो पारामा भन्छन्, "न्यु इयरका दिन लेक साइडमा पुगे मात्र हुन्छ, फेरो लगाउने काम भीडले धकेलेरै गरिदिन्छ।" पोखरेलीमा यसले एउटा यस्तो संस्कारको विकास भएको छ कि उनीहरू रमाउने मामिलामा पश्चिमाजस्तै बिन्दास छन्। लेक साइडको माहोल चियाउँदा सजिलै देखिन्थ्यो, यहाँ कसैलाई कसैको मतलब छैन। न बाटोमा हिँड्दा लाग्ने धक्कालाई उनीहरू समस्या ठान्छन्, न त हिँडिरहँदा कोही अगाडि आएर क्यामेरा तर्साउँदा नै झोकिन्छन्। बरू उल्टै पोज दिन तम्सिन्छन्। पोखरा विश्वविद्यालयमा स्नातक अध्ययन गररिहेकी विन्दु लामिछाने, २३, भन्छिन्, "कसैलाई नराम्रो गर्न पो भएन, नत्र एकअर्कासँग परिचित हुन पाउनु त सबैका लागि राम्रै हो नि!" त्यही विशेषताका कारण पोखरेलीलाई समेत हरेकपल्ट आफ्नै ठाउँ घुम्दा फरकपनको महसुस हुन्छ रे! मतलब यहाँ रमाइलोको मात्रै अर्थ छ, नेपाली हुनु वा पश्चिमा हुनुको होइन। प्रवेशद्वार पनि पोखराको प्रसिद्धि देशविदेशमा जति चुलिएको छ, पोखरा मात्रकै कारणले त्यसो भएको भने होइन। पोखरा विभिन्न सांस्कृतिक र प्राकृतिक विविधतापूर्ण क्षेत्रको केन्द्र पनि हो। आसपासका लामा/छोटा पदयात्रा मार्गहरू, अन्नपूर्ण, धवलागिरि, पञ्चासे, रोयल ट्रेक जाने द्वार हो पोखरा। समय लिएर आउनेका लागि झन्डै २३ दिनमा पूरा गर्न सकिने विश्वकै उत्कृष्ट कहलिएको अन्नपूर्ण पदयात्रादेखि तीनदेखि चार दिनसम्ममा सकिने द रोयल ट्रेकजस्ता थुप्रै विकल्प पोखरामा छन्। रोयल ट्रेक त सन् '८० को दशकमा बेलायती युवराज चाल्र्सले पदयात्रा गरेको रुट हो, जसबाट उनी मोहित नै भए। र, पछि यो मार्ग रोयल ट्रेकको नामबाट चिनिन पुग्यो। अन्नपूर्ण पदमार्गको पुनहिल होस् वा धम्पुस, पोखरा छेवैको सराङकोटबाट देखिने सूर्योदयको दृश्य होस् वा सूर्योदयअघिको राताम्मे हिमाल, जोकोही मोहित हुन्छन्। हिन्दू तथा बौद्धमार्गीले पुज्ने मुक्तिनाथ होस् वा उपल्लो मुस्ताङको साहसिक यात्रा, सुरुआत पोखराबाटै हुन्छ। पोखराको मुटु फेवातालको त कुरै भएन, माछापुछ्रेको छायाँमा दिनभर टहलिन र नौकाविहार गर्न कम्ती रोमाञ्चक हुन्न। त्यही भएर फेवातालमा व्यावसायिक रूपमा चल्ने डुंगा मात्र झन्डै सात सयभन्दा बढी छन्। पछिल्लो समय पोखरामा पर्यटकलाई अझ बढी समय 'होल्ड' गर्न थुप्रै विकल्प खुलेका छन्। स्टि्रट फेस्टिभलको सुरुआत पनि यहाँ आउने पर्यटक न्यु इयरका बेला भारतको गोवातिर जाने क्रमलाई रोक्न भनेर भएको थियो। फेस्टिभलका सडक शृंगार संयोजकसमेत रहेका व्यवसायी ज्याक तामाङ भन्छन्, "न्यु इयरमा पर्यटक होल्ड त हामीले चाहेजसरी भयो नै, त्यसले आन्तरकि पर्यटनको अनपेक्षित सफलतामा पनि पुर्यायो।" रोमाञ्चक गन्तव्य विरौटाका सुरेन्द्र पौडेल, २३, अचेल आफूलाई साहसी युवाको पंक्तिमा राख्छन्। दुई महिनाअघि प्याराग्लाइडिङ् नगर्दासम्म उनलाई त्यस्तो लाग्दैनथ्यो। "अरू चराझैँ उडेको देख्दा क्या रोमाञ्चक होला भन्ने लाग्थ्यो," उनले अनुभव सुनाए, "उडेपछि २० मिनेट जति रमाइलो लाग्यो, उत्तिकै डर पनि।" हिमाल र तालतलैयासँगै एयर स्पोट्र्सको कारण पनि पोखराको ख्याति बढेको छ। अल्ट्रालाइट उडान र प्याराग्लाइडिङ् यहाँ बढी लोकप्रिय छन्। अल्ट्रालाइटतर्फ सन् १९९६ देखि एभिया क्लबले आफ्नो उडान सुरु गरेको थियो भने सन् २०१२ यता थप दुई कम्पनी पोखरा अल्ट्रालाइट र फिस्टेल अल्ट्रालाइट थपिएका छन्। खेलौनाजस्ता दुई किसिमका हलुका जहाजमा पोखराको ३ सय ६० डिग्रीको अवलोकन गर्ने र हिमाललाई अझ स्पष्ट र नजिकबाट हेर्ने अवसर जुराउँछ यसले। एक खाले बन्द ककपिटसहितको 'फिक्स्ड विङ् एयरक्राफ्ट' छ भने अर्को खाले खुला ककपिटसहितको 'डेल्टा विङ् एयरक्राफ्ट', जसले पाइलटका साथ दुई जनालाई उडाउँछन्। एयरपोर्टको रनवेबाटै उडान भर्ने यी साना जहाज १२ हजार फिटसम्मको उचाइमा उड्न सक्छन्। १५ मिनेट आधा घन्टा र एक घन्टा गरी तीन खाले प्याकेजमा उड्ने यी जहाजले पोखराको फेरो लगाउँदै, फेवातालमाथि पि|mफल हुँदै माछापुछ्रेको फुटहिलसम्मै पुर्याउँछन्। "हिमाललाई नजिकबाट हेर्न चाहनेलाई यस्तो उडान सबैभन्दा रोचक हुन्छ," एभिया क्लबका निर्देशक प्रविन गौचन भन्छन्, "त्यसमाथि विश्वमै यसको व्यावसायिक उडान पहिलोपटक नेपालमा भएको हो र संसारका एक-दुई देशले मात्र बल्ल यसलाई व्यावसायिक बनाउने तरखर गर्दै छन्।" सन् १९९२ मा पहिलोपटक पोखरामा प्याराग्लाइडिङ् अभ्यास गरिएको थियो। यद्यपि, विश्वमै व्यावसायिक प्याराग्लाइडिङ् अभ्यास गरिएको एक दशकपछि नै पोखरामा त्यसको सुरुआत गरिएको थियो। अहिले पोखरामा मात्रै १४ कम्पनीले प्याराग्लाइडिङ् उडान अनुमति लिएका छन्। एक सय जना त स्वदेशी पाइलट नै तयार भइसकेका छन्। दुई वर्षदेखि भने सराङकोट डाँडाबाट हेम्जाको फेदीसम्मको १.८ किलोमिटरको दूरीमा तारमा यात्रा गरिने 'जिप ड्राइभ' सञ्चालनमा छ, जसमा ६ सय मिटरको त 'भर्टिकल ड्राइभ' नै हुन्छ। जिप फ्लायरका अपरेसन म्यानेजर दिनेश महर्जन भन्छन्, "प्रकृतिसँगै अब साहसिक खेलको अनुभव लिन भनेरै मानिस पोखरा धाउन थालेका छन्।" सफल उडान भइसक्दा पनि कतिपय साहसिक खेल सरकारी नीति र जनशक्ति अभावमा व्यावसायिक हुन सकेका छैनन्। जस्तो: प्यारामोटरको सहयोगले कुनै डाँडा नचढीकन समथर जमिनबाटै उचाइ लिई उड्न सकिन्छ। बिनाइन्जिन अल्ट्रालाइटमा झैँ उड्न सकिने ह्यान्डग्लाइडरको समेत परीक्षण उडान भइसकेको छ। सन् २०११ मा विभिन्न नौ देशका पाइलटले हिमालयन पारामोटर यात्रा गरे, जस अन्तर्गत उनीहरू पोखराबाट काठमाडौँ, नारायणगढ, लुम्बिनी, बुटवल हुँदै पोखरा नै फर्केका थिए। एभिया क्लबकी संस्थापक नताशा श्रेष्ठ भन्छिन्, "हवाई खेलमा पोखराले यस्ता एकपछि अर्को प्रोडक्टहरू दिन सक्छ, मात्र त्यसलाई सहयोगी हुने गरी उड्ययन नीति बनाउँदै लैजानुपर्छ।" उनले त्यसो भनिरहँदा नौपटकका विश्व ग्लाइडिङ् च्याम्पियन सिबास्टिन कावा पोखरालाई विश्वको ग्लाइडिङ् केन्द्र बनाउने उद्देश्यका साथ अध्ययनका लागि निजी ग्लाइडरमा पोल्यान्डदेखि पोखरा आएका थिए।
कलाको संगम लेक साइडका दर्जनौँ रेस्टुराँ तथा क्लबमा विश्वका विभिन्न विधाका गीत घन्किन्छन्। त्यहाँ मानिस आउँछन् नै, यस्ता फरक परिवेशबाट। र, तिनको सांगीतिक मागलाई पोखराका स्थानीय ब्यान्डले नै धानेका छन्। लेक साइडका रेस्टुराँमा अक्वेस्टिक गीतका लागि चर्चित शैलु राई, २७, ले स्कुले जीवनमै ब्यान्ड बनाएका थिए। त्यसपछि साथीहरू लाखापाखा लागे र उनी एक्लै अक्वेस्टिक गायनमा जम्न थाले। उनले संगीतको दायरा बढ्नुमा त्यहाँ आउने विदेशीहरूको योगदान रहेको सुनाए, "केही निश्चित गीत तयारी गरेर गाइन्थ्यो तर विदेशीहरूले विभिन्न खाले नयाँ गीत गाउन आग्रह गर्न थालेपछि गीतहरू सेयर हुन थाले।" अहिले उनी त्यस्ता नेपाली, हिन्दी र अंग्रेजी गीत पनि गाउँछन्। पोखराको 'फ्युजन' विविध स्थानीय संस्कृतिमा मात्र नभई त्यहाँका गीतसंगीतमा पनि झल्किएका छन्। स्थानीय गायकहरू लोकपपका अग्रणी पोखरेली गायक अमृत गुरुङलाई आदर्श मान्छन्। नेपथ्य, बोफिन्स ९८, डिमोर्चा, कन्दराजस्ता थुप्रै ख्याति कमाएका ब्यान्डका थुप्रै गीत नेपालीको मुखमा झुन्डिरहेकै छ। नेपहप संगीतमा पछिल्लो समय र्याप ब्याटलका कारण चर्चाको शिखरमा पुगेका आशिष राना 'लाहुरे' भन्छन्, "स्थानीय स्वादका गीत सुन्ने छुट्टै सर्कल छ यहाँ, ती एल्बमका रूपमा कम, मोबाइलका ब्लुटुथबाट धेरैमाझ पुग्छन्।" पोखरेलीको डायस्पोरा सर्कल पनि ठूलो र प्रभावशाली छ, जसले उनीहरूका गीत-संगीत छिट्टै धेरैबीच पुग्छन्। पछिल्लो कडीको रूपमा लाहुरेको र्याप ब्याटललाई नै लिन सकिन्छ, जुन युट्युबको माध्यमबाट रातारात चर्चाको शिखरमा पुगेको थियो। १६ माघमा कोरियाको राजधानी सोलमा पोखरेलीले एक कन्सर्ट 'गोल्डेन लाइभ कन्सर्ट' गर्दै छन्, जसमा पोखराका तीन सांगीतिक समूहहरू भाइ गुरुङ, डिमोर्चा र लाहुरे सहभागी हुँदै छन्। पश्चिमा संगीत र फेसनको प्रभाव पोखरामा धेरैअघिको हो। लाहुरे भएर ब्रिटिस आर्मीमा जानेहरू घर र्फकंदा उनीहरूसँगै पश्चिमा प्रभाव पनि पोखरा भित्रिएको हो। गीतसंगीतका सोखिन ब्रिटिस आर्मीका क्याप्टेन मीनबहादुर गुरुङले '३० को दशकमा आफ्नै घरमा एउटा हल बनाएर व्यावसायिक गायनको सुरुआत गरेका थिए, जुन डाँफे कला मन्दिरको नामबाट चर्चित थियो। "पोखरा एउटा उत्कृष्ट मध्यमवर्गीय समाज हो, जहाँका मानिसलाई खान-लाउन कहिल्यै ठूलो समस्या बनेन," प्रकाशन गृह फाइनप्रिन्टका संस्थापक अजित बराल भन्छन्, "जसले पोखरेलीलाई तुलनात्मक रूपमा बढी स्वच्छन्द र सिर्जनशील बनाउन सहयोग पुर्यायो।" नेपाली कला, साहित्य क्षेत्रका दुर्गा बराल, सरुभक्त, तीर्थ श्रेष्ठलगायत थुप्रै हस्ती अझै पोखरामा बस्छन्। "पोखराको कला-संस्कृतिको पक्षलाई पनि व्यवसायीकरण गर्नबाट व्यवसायी चुकिरहेका छन्," साहित्यकार सरुभक्त भन्छन्, "पेरसि जाँदा पर्यटकहरू पिकासोका पेन्टिङ् उनकै ग्यालरीमा गएर हेर्न खोजेझैँ खै त पोखराले दुर्गा बराललाई त्यसरी ब्रान्डिङ् गर्न सकेको ?" पोखराको माहोललाई कुनै प्रभावशाली लेखकले सिर्जनशीलताको प्रतिविम्बका रूपमा आफ्नो पुस्तकमा बुन्दो हो त त्यो पोखरा प्रवर्द्धनको राम्रो शैली हुने ठान्छन् बराल । किनभने, यो सहर सांस्कृतिक रूपमा पनि बाहुन, नेवार, मगर, गुरुङ र थकालीको संगमस्थल हो। पछिल्लो समय काठमाडौँलाई कर्मथलो बनाएका बराल जब आफ्नो गृहनगर र्फकन्छन्, यहाँको दिनचर्याले मोहित हुन्छन्। भन्छन्, "काम/लक्ष्य भन्दै दिनरात कुदिरहेको काठमाडौँबाट एकै छिन फुर्सद निकालेर पोखरा पुग्दा पनि जाडोमा घाम तापिरहेको वा नेपाल बन्दमा घरमा आराम गरेझैँ महसुस हुन्छ।" पोखरामा तालले मात्र रंग फेर्दैन। न्यु इयरमा 'वाइल्ड' बन्ने पोखरा अर्को दिनदेखि नै शान्त हुन थालिहाल्छ। जब अर्को महिना चिनियाँ नयाँ वर्ष सुरु हुन्छ, यहाँ चिनियाँ प्रतिविम्ब देखिन थाल्छन्। अक्टोबर-नोभेम्बर विभिन्न वर्णका पर्यटकको रंगीचंगी जमघटले भरन्िछ। सारमा पोखरा वर्षभरि विभिन्न रंग फेररिहन्छ। तर, रंग फेर्ने दौडमा कतै यो विख्यात सहरले आफ्नो स्थानीयता त भुलिरहेको छैन ?
-नेपाल साप्ताहिकबाट -