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नेपाल बारे भारतीय अनलाइन मिडियाले फैलाएका केही यथार्थ जस्ताको तस्तै

नेपाल से जुड़ी वो दस बातें, जिन्हें आप शायद नहीं जानते होंगे

इंटरनेशनल डेस्क। चीन ने कहा है कि नरेंद्र मोदी की नेपाल यात्रा सफल साबित हुई है। चीन की सरकारी न्यूज एजेंसी शिन्हुआ ने कहा, "17 साल में पहली बार गए किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने नेपालियों को दिल जीत लिया है। वे रिश्तों को काफी आगे और नई ऊंचाइयों पर ले गए हैं। हालांकि, नेपाल को अब संदेह हो सकता है कि कहीं भारत उसके ऊर्जा क्षेत्र पर एकाधिकार न जमा ले।"

गौरतलब है कि नेपाल के अगल-बगल में विश्व की दो बड़ी आर्थिक महाशक्ति भारत और चीन है। वह पर्यटकों के बीच लोकप्रिय देशों में से एक है। 147,181 किलोमीटर में फैला दक्षिण एशिया का यह शहर नेचुरल रिसोर्सेस और प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है। यह छोटा-सा पहाड़ी देश हाइड्रोपावर, राफ्टिंग और माउंटेन ट्रैकिंग के लिए भी मशहूर है। विभिन्न देशों के पर्यटक माउंट एवरेस्ट (दुनिया का सबसे ऊंचा पर्वत) और अरुण घाटी (सबसे गहरी घाटी) को देखने आते हैं।

इस देश में विभिन्न जाति और धर्म के लोग रहते हैं। कई सालों से माओवादी संघर्ष में उलझे होने के कारण यहां नया संविधान बनना बाकी है। इससे इसके विकास पर काफी प्रभाव पड़ा है। इन सबके बावजूद नेपाल प्राकृतिक स्रोतों सहित कई मामलों में अन्य देशों से आगे है।

जानिए नेपाल से जु़ड़े 10 फैक्ट्स...

दुनिया का सबसे स्लो इंटरनेट

नेपाल दुनिया का दूसरा देश हैं, जहां इंटरनेट की गति बहुत धीमी है। यहां 32 फीसद इंटरनेट कनेक्शन या 60 फीसद लोगों का इंटरनेट 256 kbps से भी कम स्पीड में चलता है। नेपाल में कई IPSs और कम्युनिकेशन फर्म कम दाम में इंटरनेट की गति को तेज करने का प्रयास कर रही हैं।
 नेपाल से जुड़ी वो दस बातें, जिन्हें आप शायद नहीं जानते होंगे

आगे पढ़ें: हमेशा गुल रहती है बिजली...
नेपाल से जुड़ी वो दस बातें, जिन्हें आप शायद नहीं जानते होंगे

हालांकि, नेपाल का स्थान वाटर रिसोर्स के मामले में दुनिया में दूसरे नंबर पर है। अगर इसका समुचित उपयोग किया जाए तो यह देश हाइड्रोपावर के क्षेत्र में दुनिया में एक बड़ी ताकत बन सकता है। अभी तक नेपाल में लगभग 83,000 मेगावाट हाइड्रोपावर का उत्पादन होता है। यहां के बेकार इन्फ्रास्ट्रक्चर की वजह से यह देश बिजली पैदा करने में अभी काफी पीछे है। यहां लोगों को रोजाना 9-12 घंटे ही बिजली मिलती है और हर सीज़न में 3 से 4 बार पावर कट होता है। इसी वजह से यह देश इंडस्ट्री, फैक्ट्री और ऑफिस की मूलभूत सुविधाओं के मामले में अभी भी अन्य देशों की अपेक्षा काफी पिछड़ा हुआ है।
तंबाकू के लिए फेमस
नेपाल से जुड़ी वो दस बातें, जिन्हें आप शायद नहीं जानते होंगे

नेपाल कभी चरस-तंबाकू आदि के लिए बहुत फेसम था। 70 और 80 के दशक में नेपाल की राजधानी काठमांडू में हिप्पीज लोग चरस और अन्य नशे के लिए आया करते थे। इस देश में वीड (चरस, तंबाकू) खरीदना, बेचना और इस्तेमाल करना गैरकानूनी है। फिर भी लोग चोरी-छिपे इसका व्यापार करते हैं। अभी भी वहां तंबाकू की अवैध खेती की जाती है।
वर्ल्ड हेरिटेज साइट
 नेपाल से जुड़ी वो दस बातें, जिन्हें आप शायद नहीं जानते होंगे
15 किलोमीटर के एरिया में नेपाल में सात हेरिटेज साइट्स आती हैं। इनमें पशुपतिनाथ मंदिर, स्वयंभूनाथ मंदिर, बुद्ध स्तूप, काठमांडू, भक्तपुर और पटन दरबार स्क्वॉयर शामिल हैं। यह सभी हेरिटेज काठमांडू वैली के तीन जिलों काठमांडू, भक्तपुर और ललितपुर में पड़ते हैं।
नमस्ते करना
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नमस्ते करना वैसे तो भारतीय परंपरा में अभिवादन करने का तरीका है। लेकिन नेपाल में भी हाथ मिलाकर या गले लगकर नहीं, बल्कि हाथ जोड़कर अभिवादन करने की परंपरा है। नेपाल के भारत से सटे क्षेत्रों में नमस्ते के साथ ही बड़े बुजुर्गों के पांव छूकर आशीर्वाद लेना भी अभिवादन करने का एक तरीका है।
अनेकता में एकता
नेपाल से जुड़ी वो दस बातें, जिन्हें आप शायद नहीं जानते होंगे

‘यूनिटी इन डायवर्सिटी’ स्लोगन के साथ नेपाल के लोग देशप्रेम और राष्ट्रीयता को बहुत मानते हैं। नेपाल में भगवान बुद्ध के प्रति लोगों में जबरदस्त श्रद्धा की भावना देखी जा सकती है। महाशिवरात्रि के अवसर नेपाल का बहुत बड़ा त्योहार है। इस मौके पर पशुपतिनाथ मंदिर में अपार भीड़ उमड़ती है।
नेशनल फ्लैग
नेपाल से जुड़ी वो दस बातें, जिन्हें आप शायद नहीं जानते होंगे
दुनिया में नेपाल का झंडा ही ऐसा है, जो चतुर्भुज नहीं है। इसके अलावा सभी देशों के झंडों के चार कोने होते हैं। हाल में हुए एक रिसर्च में यह माना गया है कि नेपाल का झंडा एक मैथेमैटिकल झंडा है, जो इस देश की पहचान बताता है। नीला बॉर्डर और लाल रंग के साथ ही झंडे में बना चांद और सूरज और दो त्रिकोण हिमालय और दो धर्म हिंदू और बौद्ध को दर्शाते हैं।
माउंटेन क्लाइंबिंग, ट्रैकिंग और राफ्टिंग
 नेपाल से जुड़ी वो दस बातें, जिन्हें आप शायद नहीं जानते होंगे
नेपाल में 8 सबसे ऊंचे पहाड़ या चोटियां हैं। इस वजह से यह देश माउंटेन क्लाइंबिंग, ट्रैकिंग और राफ्टिंग के लिए ट्रैवलर के बीच खासा चर्चित है। यहां हिमालय की वजह से लोग वैसे ही आकर्षित हो जाते हैं, जिस वजह से माउंटेन क्लाइंबिंग करने वालों के लिए यह जन्नत है। वहीं, यहां की त्रिशूली नदी भी रिवर राफ्टिंग करने वालों के बीच बहुत प्रसिद्ध है। एक अनुमान के अनुसार, राफ्टिंग और ट्रैकिंग में रुचि रखने वाले दुनिया के 20 फीसदी से ज्यादा लोग यहां आते हैं।
कई रिकॉर्ड हैं देश के नाम
 नेपाल से जुड़ी वो दस बातें, जिन्हें आप शायद नहीं जानते होंगे
नेपाल के नाम दुनिया के कई रिकॉर्ड हैं। इसमें से सबसे पहले 8,848 मीटर की ऊंचाई वाला माउंट एवरेस्ट है। इसके साथ ही यहां धरती की सबसे ऊंची 4800 मीटर की तिलिचो झील, 3600 मीटर ऊंचाई वाली 145 मीटर गहरी Shey phoksundo झील, 1200 मीटर गहरी Kalidanki वैली और सबसे ऊंची अरुण घाटी है। इसके अलावा भी नेपाल के नाम कई वर्ल्ड रिकॉर्ड हैं, जैसे दुनिया का सबसे छोटा आदमी चंद्र बहादुर इसी देश का है।
गोरखा सैनिकों की अतुलनीय बहादुरी
नेपाल से जुड़ी वो दस बातें, जिन्हें आप शायद नहीं जानते होंगे
नेपाल के पड़ोसी देश भारत और चीन पर अंग्रेजों ने सालों साल राज किया, लेकिन कोई भी ताकत आज तक नेपाल को हाथ नहीं लगा सकी है। इसका श्रेय 'गुरखा' को जाता है। नेपाल के गोरखा बहादुरी और पराक्रम के लिए जाने जाते हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण विश्व युद्ध में उनका प्रदर्शन था।
श्रोत :- दैनिक भास्कर

भारतीय प्रधानमन्त्री मोदीको नेपाल भ्रमण एक बिष्लेशण-"नकुल ढकाल नबिन"

                     हातमा सुनको चैन, गलामा सुनको मोटो लामो सिक्री, झलल झल्किने टाई सुट, ऐना सरि टल्किने जुत्ता, एक दुइ करोडको घडी, हिन्दा पनि स्लो इमोशनमा टक्क आउछन अनि नेपाली नेताहरुलाइ उत्तेजित हुने छेद बिक्षद पार्ने खालको ब्यबाहार गरेर राजनीतिक दलहरुलाई औलो हालेर धर्मको कुरो अनि धम्कि पूर्ण सैलिमा सन्धि सम्झौता र नेपालि राजनीतिलाइ नया हिंशा तर्फ धकेल्ने गरि मोदी आउदै छन् हामि सबैले सायद यस्तै सोचेका थियौ, हाम्रो मनमा मोदीको आगमनले पिडा दिईरहेको थियो,


तेस्माथी पनि नेपाल सरकारले गरेको भब्य स्वागत र उनले बिमान मार्फत पठायका दुइ वटा अरबौ रुपियाका गाडीले पनि मनमा संका पैदा गरेको थियो, नेपाली समय अनुसार साउनको अठार गते बिहान दस पचपन्न बजे नेपाली भूमिमा भारतीय प्रधानमन्त्रि मोदीले पाइलाटेके, बिमान बाट मन्द मुस्कुराउदै एक जना व्यक्ति झरे जसको सरिरमा साधारण दौरा सुरुवाल एउटा स्टकोट सामान्य जुत्ता अनि हातमा सामान्य घडी, उनि बिमान बाट ओर्लिय अनि हात हल्लाउँन सुरुगरे, उनको स्वागतमा प्रतीक्षा गरिरहेका नेपालका प्रधानमन्त्रीले जानी नजानी स्वागत गरे, नेपालि प्रधानमन्त्रि सुसिल कोइराला चिटिक्क परेर कालो चस्मामा सजियका थिय, लाग्थ्यो भर्खर कुरकुरे बैश चढेको नौ जवान, धोका दियो चाउरी परेको गाला अनि सेताम्मे फुलेका रौ हरुले, मोदी हायात hotel पुगेर केहि छिन बिश्राम गरे लगत्तै दिउस संसद भबन पुगे, उनको मन्तब्य र नेपालिलाइ सम्बोधन गर्ने कार्यक्रममा मोदीले नेपालि भाषा बाट बोल्न सुरु गरे, म भने एक छिन अल्मल्लीय, होइन के हुदै छ, एक जना भारतीय प्रधानमन्त्रि नेपालि भाषामा सम्बोधन गर्दै छन् ? कसले सिकायो होला, लेखेर दियको पनि कति सुद्द बोलेको, आहा मनमा कति आनन्द आयो, एउटा बिदेशी मुख्य सक्तिले नेपाली भाषामा नेपालीलाई सम्बोधन गर्दा अति आनन्द यो मनमा, उनि बोल्न सुरु गर्दै उनले सुरुमै नेपालको बरण मात्र सुरुगरेनन, उनि आफु गौरब भयको समेत जानकारी गराय, उनले गौतम बुद्दको देशमा सान्तिको कामना गर्न आयको जानकारी दिय, पसुपतिको देशमा दर्शन गर्न र आफुले आसिर्बाद लिन आयको जानकारी मात्र गरायनन सम्पूर्ण भारतीय नागरिकलाई पनि आकर्सण हुने गरि सम्बधन गरे, नेपालले सहयोग चाहे भारतीय नागरिकहरुलाई पर्यटनको रुपमा नेपाल भित्र्याउन सक्ने र आफुले सहयोग गर्ने जानकारी दिय, नेपालले बिजुली उत्पादन गरेर नेपाललाई मात्र होइन भारतलाइ पनि उज्यालो दिन र ब्यापार गर्न आग्रह गरे, उनको मुख बाट निस्कियको हर सब्दले एउटा मात्र भाब झल्किन्थ्यो, नेपाल नरहे भारत रहदैन, nepal कम्जोर भय भारत सक्षम हुन सक्दैन, नेपाललाइ बिस्वका समृद्द देशहरु संग हातमा हात काधमा काध मिलायर हिड्द सक्ने सक्षम मुलुकको रुपमा देख्न चाहेको जस्तो बुझिन्थ्यो, उनि बोल्दै गय, उनि बोल्दै गर्दा एस्तो लाग्थ्यो पशुपतिनाथ मन्दिर छोडेर साक्षात इस्वरिय सक्तिमा संसद भबन प्रवेश गरे अनि नेपाली जनता लाइ सम्बोधन र नेपाली नेतालाई परिवर्तनको सिक्षा दिय, उनि बोल्दै गर्दा संसद भबन उल्लासमय बनेको थियो, हिजो bharat मुर्दाबाद भन्नेहरु लज्जास्पद हुदै टुलुटुलु हेरिरहेका थिय, भारतीय मन्त्रि बोल्दै गय समय सकिदै गयो, तर हाम्रो लागि समय प्रयाप्त भयन हामि अझ धेरै नेतालाई सिक्षा दियको हेर्न चाहान्थेउ, अन्त्यमा उनले नेपाललाई एक खर्ब बराबर नेपालि रुपिया सहयोग गर्ने घोषणा गरे, संसद भबन तालीले गुन्जयमान बन्यो, कतिले त सायद औला भाच्दै थिय होला, मेरो भागमा कति पर्यो, यसरी भारतीय मन्त्रिले आफ्नो मन्तब्य टुंग्याय, हायत hotel तर्फ जादै गर्दा उनले आफ्नो स्वागतमा रहेका सर्बसाधारण नेपालि देखे, अनि गाडी बाट उत्रिय र स्वागत ग्रहण गरे, हात मिलाय हात हल्लाय, उनि साच्चै महान व्यक्ति हुन, उनीमा जादु छ, मैले भने दुइ वटा कुरा सम्झीरहेको थिय, संबिधान सभा एक हुदा प्रचण्डले गलामा भिरेको माला, प्रचण्डलाइ नेपालि जनताले गरेको बिस्वास, उनले पायको सम्मान, प्रचण्ड द्वारा रास्ट्र नेर्तित्वको प्रतीक्षा, अनि प्रचण्डले एक बर्ष बित्न नपाउदै नेपाली जनतालाई दियको निराशा धोका, उनको पदमोह ब्यबाहार, उनको मस्ती गर्ने सैलीको व्यक्तित्व, प्रचण्डलाइ अवसरले साच्चै पछ्छ्यायको थियो,तर उनले त्यो अवसर गुमाय, मोदीको अनुहारमा देखियको इस्वरिय सक्तिको रुप अस्ति प्रचण्ड माथि पनि देखेका थिय नेपाली जनताले, तर त्यो अमुल्य घात संबिधान सभा दुइमा महँगो साबित भयो, उनको पाटीले नराम्रो हार ब्योहोर्नु पर्यो, मलाइ बिस्वास छ मोदीको आगमनले नेपालि राजनीतिलाई नया उर्जा दियको हुनुपर्छ, मेरा नेताहरुमा केहि सकारात्मक सोचको बिकाश भयको हुनुपर्छ, एध्धेपी भयन भने नेपालि राजनीत कुकुरको पुच्छार ठहरिने छ,

नकुल ढकाल नबिन को फेसबुक  बाट

सामाजिक निरंकुशताको भुमरीमा नन्दप्रसाद–गंगामाया "द्वन्दकालको एक कहालीलाग्दो घटना "

        कनकमणि दीक्षित 


              आज नन्दप्रसाद र गंगामाया अधिकारीको आमरण अनशनको २७० दिन भएको छ। नसाबाट कहिले जाने कहिले नजाने गरी ‘इन्ट्राभिनस्’ स्लाइन लगाएका कारण उहाँहरू जीवित रहनुभएको छ। शरीरका ‘अर्गन’ हरू आजसम्म ठीकै देखिएका छन् तर जीउ भने हाड–छाला मात्रको अवस्थामा पुगेको छ। गंगामायाको अनुरहारमै निरन्तर पीडा झल्कन्छ भने अघिल्ला दिनमा बोल्न र तर्क गर्न नथाक्ने नन्दप्रसाद आगन्तुकलाई टोलाएर मात्र हेर्नुहुन्छ, प्रतिक्रिया बेगर।

तर आजभोलि आगन्तुक पनि त्यत्तिको छैनन्। मुख्यतः ‘संक्रमणकालीन न्याय’ सम्बन्धी राज्यको कर्तुत तथा दम्पतीको अनशन नत्याग्ने निरन्तर अडानको अगाडि भूमिकाहीन बन्न पुगेका कारण अधिकारकर्मीदेखि अन्य हितैषी तथा सरकारी कर्मचारीको वीर अस्पतालको ‘पुरानो आईसीयू’ को शैय्या नं १७ र १८ मा भेट्न आउनेको संख्या झण्डै शून्यमा झरेको छ।
आज आएर अधिकारी दम्पतीको स्याहार, रेखदेख तथा चासोमात्र त्यहाँ खटिएका प्रहरी जवान तथा आइसियूका नर्स र डाक्टरको हातमा पुगेको छ। दम्पतीको प्रसंगसँग परिचित वीर अस्पतालका निर्देशक डा. बुलन्द थापाले अवकाश पाइसकेका छन् भने संवेदनशील रहेका प्रधानमन्त्री कार्यालयका सचिव कृष्णहरि बाँस्कोटा पनि एक–दुई दिनमा अवकाश लिंदैछन्।

स्वास्थ्य सन्दर्भ
चिकित्सक तथा नर्स टोलीको प्रयासले यतिका दिन सुतेरै बस्दा पनि ‘प्रेसर सोर’ ले दम्पतीलाई दुःख दिएको छैन। तर मुखबाट खाना नछिरेको २७० दिन भइसक्दा जीउमात्र छालाले मोडेको हाडमा परिणत छ। घाँटीको नसाबाट ‘टोटल प्रोटिन न्यूट्रिसन’ दिन सम्भव थियो तर गंगामायाको त्यो प्रसारण गर्ने ‘सेन्टर लाइन’ नली पनि टालिएको छ। नन्दप्रसादको उक्त नली खुला छ तर लिन मानेका छैनन्, नर्सका अनुसार। केही हप्तालाई ‘टिपिएन’ को थैली पनि आउन छाडेको थियो, आपूर्ति गर्ने ‘हनुमान फर्मा’ लाई सरकारले शुरूदेखिको खर्च नदिलाएकाले, तर मिडिया रिपोर्टिङको कारणले हुनुपर्दछ अहिले थैली उपलब्ध छ। नन्दप्रसाद र गंगामायाको अवस्था हेर्दा कुनै पनि बेला शरीरको कुनै अंगको ‘अर्गन फेल्योर’ हुन सक्दछ, चिकित्सक भछन्। यत्तिको लामो समय, दुई–दुई जना आमरण अनशनकर्ता आफ्नो अभियानलाई निरन्तरता दिनुले उहाँहरूको अठोट, आत्मबल तथा मुलुक–समाजको अवस्था दर्शाउँछ।

दम्पतीको अडान
हरेक सरोकारवाला तथा भेट्न जानेलाई यही लाग्दछ कि दम्पतीले यस्तो कठोर अवस्थामा आफ्नो अनशन किन जारी राखेको? खिलराज रेग्मी सरकारको बेला मन्त्रीहरूको विशेष संवेदनशीलता थियो, र यसअघि विभिन्न दलका शीर्षस्थ नेताले भेट्न गएकै हुन् एक–एक गरी, र दम्पतीलाई आफ्नो छोराको हत्याको सन्दर्भमा न्याय दिलाउने कबुलसहित फर्कन्थे। तर ती नेताकै अगुवाइको वर्तमान सरकार दम्पतीसित बिल्कुलै टाढा रहेकोले बदलिएको राजनीतिक माहोल दर्शाउँछ। लोकतान्त्रिक नेताले मंसिरको निर्वाचनपछि दम्पतीको अवहेलना गरेका छन्। उनीहरूको अभियान र अनशनलाई झन्झटको रूपमा लिएका छन्।

मुद्दा उही, तर राष्ट्रियदेखि अन्तर्राष्ट्रिय हरेक क्षेत्रबाट अधिकारी दम्पतीको अनशनबारे चासो र सरोकार घटेको छ, तैपनि उहाँहरू आफ्नो अनशन तोड्न मान्नुहुन्न। यसको कारण यति मात्र हुन सक्दछ— मनमस्तिष्कमा ९ वर्ष अगाडि यातना दिई–दिई माओवादीद्वारा चितवनमा मारिएका छोरा कृष्णप्रसाद अधिकारीको झल्झली सम्झना तथा उनका हत्याराहरूमाथि कारबाहीको चाहना। अरू कुनै कारण हुन सक्दैन यत्तिको पीडा उहाँहरूले सहनुको, न कसैको उक्साहट न न्यायभन्दा अरू कुनै ‘फल’ को प्राप्ति। अनशनको दिन बढ्दै जाँदा उहाँहरूलाई सरकारले केही गर्ला भन्ने विश्वास हरायो र नेपालमा न्याय सम्पादन कति खस्केको रहेछ भन्ने उहाँहरूको अड्कल सावित हुँदै गयो, यसले अनशनलाई निरन्तरता दिने अठोट बढाइदियो, घटाउनुभन्दा।

अधिकारकर्मीको भूमिका
मानवअधिकारकर्मीहरूको नजरमा अधिकारी दम्पतीले आफ्नो छोराको हत्यारालाई कठघरामा देख्ने चाहना राख्नु एकदमै उचित हो, यो त नागरिक दायित्व समेत हो। आफूलाई प्रत्यक्ष पीडा नपरेकाले ‘फर्गिभ एण्ड फर्गेट’ भन्दै सुझाव दिनु सजिलो होला, तर न्यायको खोजी पीडित परिवारको नितान्त निजी अधिकार अन्तर्गत पर्दछ। नन्दप्रसाद र गंगामाया जस्ता धेरै पीडितजन सामाजिक अवहेलना खेप्दै न्यायको लडाइँमा लागिपरेका छन्।

अधिकारकर्मीले ‘डलरखेती’ गर्दै अधिकारी दम्पतीलाई अनशन बस्न उक्साएको भन्ने आरोप तेस्र्याइने गरिन्छ मुख्यतः माओवादी प्रोपोगाण्डा अन्तर्गत। र नेतागणदेखि अलिपरबाट यो प्रसंग नियालिरहेका व्यक्तित्वहरूको अधिकारकर्मीसँग आग्रह हुने गर्दछ, “लौ न अनशन छुटाउन लगाउनु पर्‍यो !” यसले अधिकारी दम्पतीको अडान र अभियानको अपर्याप्त बुझाइ झल्काउँछ र न्यायको खोजीमा लागेका उहाँहरूप्रति असंवेदनशीलता। अधिकारकर्मीहरूले बारम्बार दम्पतीलाई निजी र सार्वजनिक आह्वानद्वारा अनशन तोड्न गरेको पहलप्रति पनि यस्तो अभिव्यक्तिले अन्याय गर्दछ। मानौं, अधिकारकर्मीले वास्तवमा अधिकारी दम्पतीलाई उक्साएकै हो, र ती अधिकारकर्मीले भन्दाखेरी उहाँहरूले अनशन अन्त्य गरिहाल्नुुहुन्छ। अघिल्लो पटक २३ भदौ २०७० बिहान वरिष्ठ सरकारी कर्मचारी तथा अधिकारकर्मीको पहलमा अधिकारी दम्पतीले ४७ दिनमा अनशन तोडेकै हुन्, तर उहाँहरूले कबुल गरिएका बुँदाहरूको सन्दर्भमा सरकारी निष्क्रियताको निन्दा गर्दै कसैसँग सम्पर्क नगरी ८ कात्तिक २०७० मा पुनः दोस्रो पटक अनशन थाल्नुभएको हो।

सरकारी दायित्व
सरकारी पहललाई नजरअन्दाज गर्न मिल्दैन। आफ्नो नागरिकप्रतिको दायित्व निर्वाह गरी गंगामाया–नन्दप्रसादको सुरक्षासहित स्वास्थ्य सम्बन्धी जिम्मा सरकारले लिएकै हो, लिनुपर्ने पनि थियो। माओवादी दबाबमा कतिपय कुरामा सुस्तता हुँदाहुँदै पनि प्रहरीले अनुसन्धान अगाडि बढाएकै हो। सरकारी अनुसन्धानले कृष्णप्रसादलाई चितवन, टाँडीको बकुलर चोकमा हत्या गर्नेमध्ये दुईको द्वन्द्वकालमा मरण भएको र एक उत्तरी आयरल्याण्डमा रहेको पत्ता लगायो। यस्तै सरकारले चितवन जिल्लामा कारबाही पनि अगाडि बढाएकै हो।

अधिकारी दम्पतीको फुजेल गाउँका सम्भवतः हत्यामा संलग्न मतियारलाई समाउन आग्रह थियो भने सरकारी ध्यान वास्तवमा गोली चलाउने माथि केन्द्रित थियो। ‘मतियार’ आरोपितहरूलाई समाती तारेखमा छुटाउने काम भयो जसले दम्पतीलाई रुष्ट तुल्यायो। अधिकारी दम्पतीलाई धेरैचोटि अधिकारकर्मीहरूले सम्झाउन खोजेकै हुन् कि गोली चलाउने पक्राउ परेपछि अरूहरूको पोल खुल्दछ। तर फुजेलमा बस्ने दम्पती भने आफ्ना गाउँका मतियारतर्फ मात्र लक्षित रहनुभयो, चितवनमा हत्या गर्ने ‘शार्पशूटर’ उहाँहरूको लागि अलिपरको कुरा जस्तो देखियो।

माओवादी प्रभाव
सम्पूर्ण द्वन्द्वकालका घटना छानबिन र कारबाहीको सन्दर्भमा सरकार, नागरिक समाज तथा बौद्धिक वर्गलाई माओवादी अडान र अभिव्यक्तिले असर पारेको देखिन्छ। माओवादी दल द्वन्द्वकालका कुनै पनि घटनालाई अनुसन्धान र कारबाहीमा नलग्ने पक्षमा छ।
शान्ति सम्झौतामा द्वन्द्वको क्रममा मारिएका घटनामा छुट दिने भनेको छ भने माओवादी ‘द्वन्द्वकाल’ का हरेक घटनाको मुद्दा फिर्ता वा निष्क्रिय गराउन चाहन्छ। एउटै पनि द्वन्द्वकालका जघन्य अपराधका दोषीमाथि अनुसन्धान र कारबाही भए आफ्नो पार्टी संरचना गल्र्याम्गुर्लुम् भत्कने डर माओवादी नेतृत्वलाई छ। एउटामाथि कारबाही भए उसले सबैको पोल खोलिदिनेछ भन्ने आशंका छ। यसै कारण माओवादीले हर तरिकाले कृष्णप्रसादको हत्याको छानबिन तथा न्यायिक प्रक्रियालाई अवरोध पु¥याउन चाहन्छ, अन्य अभियोगमा जस्तै— डेकेन्द्र थापा, गुरुप्रसाद लुईंटेल, अर्जुनबहादुर लामा, उज्जनकुमार श्रेष्ठ इत्यादिको हत्या सन्दर्भ।

माओवादी सरकार र सत्तामा रहँदासम्म एमाले र कांग्रेसले द्वन्द्वकालका पीडितलाई आफ्नो सहयात्री सम्झेका थिए होलान्। तर जब मंसीर २०७० को निर्वाचनद्वारा यी दुई दल सत्ता सम्हाल्न पुगे, अरू नै कुरा उनीहरूको प्राथमिकतामा पर्‍यो, र पीडितजनलाई चटक्कै बिर्सिदिए। एक त संविधान बनाउने बेलामा माओवादीलाई बखेडा गर्न अवसर नदिनु उचित भन्दै माओवादी क्रियाकलापलाई तर्क र मानवीयताको सिद्धान्तद्वारा सामना गर्नुको साटो पीडितको मुद्दालाई ओझेलमा पार्न एमाले र कांग्रेसको नेतृत्व राजी भए। जुन कारणले सत्य निरुपण आयोगको कानून पीडकमैत्री हुनगयो, त्यसैगरी पीडितको फौजदारी न्याय अन्तर्गत जघन्य अपराध गर्नेलाई कारबाहीको मागको पनि बेवास्ता भयो। यसै बेवास्ताको शिकार फुजेल गाउँका अधिकारी दम्पती पनि पर्न गए। एमाले र कांग्रेसले निर्वाचन जित्नुको एउटा मूल कारण थियो, पीडितहरूको साहसिक क्रियाशीलता जसले माओवादीको वास्तविक क्रूर अवसरवाद र हत्या–हिंसा मोह छरपस्ट पारिदियो, तर पहिलो घडीमै यी दुई विजेता दल पीडितलाई अवहेलना गर्न र छेउ पार्न अग्रसर भए।

नेपाल सेना यो सब सन्दर्भमा चुपचाप देखिए पनि उसको पर्दा पछाडिको अडानले पीडितको अभियानलाई असर पारेको छ। माओवादी ज्यादतीकर्तालाई कारबाही गर्ने भए आफ्नो माझका ज्यादतीकर्तालाई पनि अदालतीय कारबाही हुने हुँदा सेनाले कांग्रेस र एमाले माथि दबाब पारेको छ र यसको प्रत्यक्ष असर अधिकारी दम्पतीलाई परेको छ। माओवादी, सेना, कांग्रेस र एमालेले आफ्नो स्वार्थ हेरे, वीर अस्पतालको पुरानो आईसीयूका अनशनरत दुई ज्यानलाई मृत्युतर्फको यात्राबाट बचाउन आवश्यक ठानेनन्।

छोरा नूरप्रसाद र मातापिताको सत्याग्रह
स्वर्गीय कृष्णप्रसादका दाइ नूरप्रसाद पनि द्वन्द्वपीडित परिवारका सदस्य हुन् मातापिता जस्तै। उनले पनि धेरै भोगे। यसअघि ४७ दिनको अनशन तोडाउन उनले पनि अन्ततोगत्वा सहयोग गरेकै हुन्। तर अधिकारकर्मीहरूले दोस्रो अनशनको दौरानमा जेठा छोरासँग घरी–घरी सहयोग माग्दा उनी “मेरा बुबाआमाले जे चाहनुहुन्छ त्यही गर्नुहुन्छ” भन्ने अभिव्यक्ति दिंदै पन्छिए। अधिकारकर्मीको विचारमा एउटा छोराले बाबुआमाको सन्दर्भमा पु¥याउनुपर्ने संवेदनशीलता उनले देखाएनन्, जबकि अधिकारकर्मीको भन्दा उनको आह्वान माता र पिताले सुन्ने र अनशन तोड्ने सम्भावना अलिकति भए पनि थियो। तर उनले पहल गरेनन्। अधिकारकर्मीहरूसँगको विभिन्न छलफलमा उनी यत्तिको चर्को बोले कि ‘हामी शान्तिपूर्ण समस्या समाधानमा विश्वास गर्छौं’ भनी सार्वजनिक विज्ञप्ति निकाल्नुपर्ने अवस्था आयो।

नन्दप्रसाद तथा गंगामायाको अनशनलाई सत्याग्रह नै भन्नुपर्छ किनकि उहाँहरूले मात्र कानूनको बाटो रोजेको र अनुसन्धानको माग राखेको हो।

स्व. कृष्णप्रसादकी माता गंगामाया अनशनमा स्वेच्छाले बसेको हो कि होइन भन्ने पनि प्रश्न उठ्न सक्दछ, र नन्दप्रसादलाई यो लेखक लगायतले पनि गंगामायाको अनशन तोडाउन आग्रह गरेका थियौं। नन्दप्रसादले हामीसामु त्यसो गर्न मान्नुभएन, ‘उनको आफ्नो विचार हो’ भन्दै। तर गत केही महीनाको दौरानमा दुईचोटि यो लेखक गंगामायासँग नजिक गई एक्लै कुरा गर्दा उनी राजीखुशी अनशनमा बसेको भान हुन्थ्यो, ‘अब त मरिने भो क्यार, न्याय पाइने भएन। .... न्याय पाएको हामीले शायद माथिबाट हेरौंला अब। .... हरेक चोटि कृष्णप्रसादको याद आउँछ र मुटुमा कीला रोपे जस्तो हुन्छ....’ — यस्तो थियो उहाँको अभिव्यक्ति।

यस लेखकको बुझाइमा नन्दप्रसाद तथा गंगामायाले अनशन आफ्नो ज्यान लिने गरी बस्नुको दुइटा कारण छः १) दिवंगत छोराको याद मानसपटलमा घरी–घरी आउने अथवा ल्याउन सक्ने मानसिक शक्ति। २) न्याय प्रक्रियामाथिको अडान र आस्था।

अधिकारकर्मीहरूले सरकारलाई न्याय प्रक्रिया अगाडि बढाउन धेरै प्रयास गरेको र त्यो कुरा दम्पतीलाई सुनाउँदै अनशन अन्त्य गर्न धेरै पटक आग्रह गरेकै हो, निजी भेटमा र सार्वजनिक आह्वान समेत गर्दै। तर उहाँहरूले स्वीकार्नुभएन। नन्दप्रसाद र गंगामायाले अनशन अन्त्य नगर्नाले धेरैलाई अप्ठेरो र असजिलो भएको त छ, तर दम्पतीको पीडा, एक्लोपन र मनको विह्वलतासामु ती अप्ठेराहरू केही पनि होइनन्।

एक जना होइन, दुई–दुई जनाको यस्तो अठोट र अडानको पनि शायद विश्वमा अन्यत्र धेरै उदाहरण पाइँदैन। यसरी सत्याग्रहमा बस्ने दम्पतीमाथि जसरी अनादर र गालीको वर्षा भएको छ, त्यस्ता विचार र बोलीलाई सहज आत्मसात् गर्न मिल्दैन। जबकि दम्पतीले ज्यान साँच्दै न्यायको लागि लडेको उचित हुने भनी धेरैचोटि उहाँहरूलाई सम्झाइएको छ। यो लेखकको मान्यता पनि उहाँहरू बाँचेर लड्नुपर्छ भन्ने हो, तर राज्य र न्यायप्रणालीमा अविश्वासको कारण म नतमस्तक हुन सक्छु, तर दम्पतीलाई गाली गर्न भने सक्दिनँ।

फुजेल सन्दर्भ
गोरखाको फुजेल गाउँका माओवादी समर्थकहरू अधिकारकर्मीसँग आक्रोशित भएको देखिन्छ, अधिकारी दम्पतीको मुद्दालाई लिएर अगाडि बढेको कारण। उनीहरूले अधिकारी दम्पतीको गाउँमा त्यतिको राम्रो सामाजिक छवि नभएको कुरा अगाडि सार्दछन्, जबकि आमा र बुबाको समस्या १६ वर्षे छोरालाई हत्या गर्न हुने हो होइन उनीहरू आफैंले बुझ्नुपर्ने कुरा हो। फेरि वास्तविक हत्यारालाई नखोजी आफूलाई फन्दामा पारेको भन्ने आरोप पनि उनीहरू लगाउँछन्। त्यसो हो भने वास्तविक हत्यारा खोज्न आफू समर्थक रहेको माओवादी पार्टीको नेतृत्वलाई दबाब दिन उहाँहरूको कर्तव्य हुनुपर्ने हो।

सच्चा अधिकारकर्मीको माग यत्ति मात्र हो कि वास्तविक हत्यारा तथा हत्याका मतियारहरूलाई न्यायको कठघरामा उभ्याइयोस्। जघन्य अपराधलाई आममाफी दिनुहुन्न, र फौजदारी न्याय प्रणाली अन्तर्गत दण्डित हुनुपर्दछ भन्ने मान्यता अन्तर्राष्ट्रिय पनि हो, आम नेपाली नागरिकको मान्यता पनि हो। यो पनि अन्तर्राष्ट्रिय र नेपाली मान्यता हो कि निर्दोष कोही माथि नाजायज कारबाही नहोस् र गलत या पूर्वाग्रही आरोप खप्नु परेकाहरूले सफाइ पाउन्। तर भान यस्तो हुन्छ कि अधिकारी दम्पतीको दुखद् निधन हुन गयो भने सबै मतियार र आरोपितलाई ‘हाइसञ्चो’ हुन्छ। सच्चा नागरिकले हत्याराको खोजीमा सघाउनुपर्ने हो। कसैको ज्यान हरण हुनुहुँदैन, र कृष्णप्रसादको भएको छ।

 
संक्रमणकालीन न्याय
द्वन्द्वपीडित समुदाय र अधिकारकर्मीहरूको विरोधका बाबजूद सत्य निरुपण आयोगको त्रुटिपूर्ण कानून बन्नाले नन्दप्रसाद र गंगामायाको सत्याग्रहलाई ओझेलमा पारिदिएको छ। यो ठूलो त्रासदी हो। ‘हामीले गर्न सक्ने जति गर्‍यौं अब सबै सत्य निरुपण आयोगको हातमा छ’ भन्दै सरकार र दलका नेतृत्व पन्छिन पाएका छन् जबकि जानाजान पीडकमैत्री कानून आफैंले बनाएका छन्। अन्य द्वन्द्वकालका मुद्दा जस्तै नन्दप्रसाद र गंगामायाको अभियान पनि छेउ लागेको छ र यो अझै कठोर छ किनकि विना आश उनीहरूले अनशनलाई निरन्तरता दिएका हुन्। न त सही संक्रमणकालीन न्यायप्रणाली अगाडि बढ्ने देखिन्छ, न त उत्तरी आयरल्याण्डमा रहेका हत्यारा आरोपितलाई चितवन जिल्ला अदालतको आदेश अनुसार नेपाल ल्याउन सक्रिय पहल गरेको देखिन्छ। अब त अधिकारकर्मीले अनशन तोड्नुस् भनेर तर्क गर्ने ठाउँ नै रहेन, यसैले टुलुटुलु उहाँहरूको अवस्था बिग्रेको देख्नुबाहेक अरू गर्न सक्ने केही छैन। आफ्नो ज्यान बचाउन राष्ट्रिय तवरका नेताहरू लस्करै विदेश गइरहेछन् भने द्वन्द्वपीडितका प्रतीक अधिकारी दम्पतीलाई वीर अस्पतालको शैय्यामा विलीन हुन दिइरहेछन्।

सामाजिक निरंकुशता
न्यायको लागि नन्दप्रसाद र गंगामाया अनशनमा बस्दा धेरैलाई असहज लागेको छ। आफ्नो निष्क्रियता या निष्प्रभाविकताको सन्दर्भमा चित्त बुझाउने धेरै बौद्धिक र विचार निर्माणकर्ताहरूले या त दम्पतीलाई नै गाली वर्षाउने गरेका छन् या त अधिकारकर्मीलाई ‘उक्साएको’ भनेर आरोप लगाउने गरेका छन्। जबकि सही बाटो भनेको ज्यादतीकर्तालाई कठघरामा ल्याउन न्यायको आवाजमा आफ्नो बोली मिसाउनु उचित हुनेथियो।

‘नन्दप्रसादले दुई अर्ब मागे’ भन्दै धेरैलाई पैसाको खेल त रहेछ नि भनेर आफूलाई पन्छिन सजिलो भएको छ। तर त्यो त राज्यसत्ताद्वारा नागरिक समाजप्रतिको आक्रोशको रूपमा लगाइएको आरोपको रूपमा लिनुपर्ने हो, छातीमाथि हात राखेर हेर्ने हो भने। तर नन्दप्रसादले दुई अर्ब मागे भनेर हामी एक–एक नागरिकलाई सजिलो बनाइदिएको छ, दम्पतीको अनशनबारे सैद्धान्तिक अडान नबनाउन र नलिनको लागि। ‘ए, यो त पैसाको खेल त रहेछ नि’, भन्दै हामी पन्छिन पायौं। आफ्नो नागरिक दायित्व पूरा नगर्ने, आफ्नो साहसको कमी लुकाउने र अर्कामाथि गाली थुपार्न रुचाउने बढ्दो प्रवृत्तिलाई ‘दुई अर्ब’ प्रसङ्गले सजिलो बनाइदियो— न्याय, अदालतीय कारबाही, माओवादी आचरण र आफ्नो अकर्मण्यताबारे केही भन्नै परेन। कमजोर बन्दै गएका दम्पतीलाई पैसाखोर भन्न पाइयो, जसरी मानवअधिकारको कुरा गर्नेलाई डलर खेताला भनी हियाउन पाइयो।

नागरिक समाजका ‘अगुवा’ भनिनेहरूले नन्दप्रसाद–गंगामायाको न्यायको मागबारे शब्दोच्चारण नगरेकोमा शायद इतिहासले उहाँहरूलाई प्रश्न गर्नेछ। शक्तिको भक्तिमै त सबथोक अडेको हुँदैन। यस्तै दम्पतीलाई ‘कसैले उक्साएको’ भनेर पन्छिन खोज्ने नेपाली कांग्रेस र एमालेका नेता र अन्य विश्लेषकलाई पनि धिक्कार्नुपर्ने हुन्छ, आफ्नो मानवीयता तथा तर्क–क्षमता बिर्सेकोमा।

यो पनि सम्भव छ कि नन्दप्रसाद र गंगामायाको दुखद् निधन हुन गए वर्तमान शिथिल र गैर जवाफदेही राजनीतिक वातावरणमा समाज हल्लिने अवस्था नआउला। तर नेपालको इतिहासले उहाँहरूको सत्याग्रहलाई उच्च सम्मान दिनेछ किनकि यो न्याय प्राप्तिद्वारा समाज रूपान्तरण गर्ने दर्शनमा आधारित छ, हत्याप्रति संवेदनशीलतामा आधारित छ, आफूलाई दुःखदिने तर अरूलाई नदुखाउने अहिंसामा आधारित छ।  

नन्दप्रसाद र गंगामायालाई वीर अस्पतालमा रहेको कुरा बिर्सिन सबैलाई सजिलो भएको छ। आखिर उनीहरूले आफैंलाई हानि गरेका छन्, कसै विरुद्ध हात उठाएका छैनन्, र न्यायप्रणाली अन्तर्गत नै जान कोशिश गरेका छन्। आफूले भनेजस्तो नहुँदा आफैं भष्म हुन तयार छन्।

हरेक तरिकाले हरेक कोणबाट हेर्दा नन्दप्रसाद र गंगामायाको सत्याग्रहको अवहेलना भएको छ, राज्यको बौद्धिक, सरकारी, दलीय तथा नागरिक समाज क्षेत्रबाट। उहाँहरूले प्राण त्याग्नुभयो भने तत्कालै धेरैलाई केही असर नपर्ला, तर इतिहासले हामी सबलाई धिक्कार्ने छ।

हा हा हा 'पिसाब फेर्नुस्, एक रुपैयाँ लैजानुस्'

दारेचोक, (चितवन)- तपाईंले पिसाब फेरेबापत कहिल्यै पैसा पाउनुभएको छ? बरु २ देखि ५ रुपैयाँसम्म तिर्नुभएको पो होला। तर, पृथ्वी राजमार्ग छेवैमा चितवन, दारेचोक–७ पुग्नुभयो भने तपाईंले पिसाब फेरिदिएबापत उल्टै एक रुपैयाँ पाउनुहुनेछ। स्थानीय श्रीरेन्द्रप्रकाश पोखरेल आफ्नो चर्पीमा पिसाब फेरिदिनेलाई विगत ६ वर्षदेखि पैसा दिइरहेका छन्।
यसरी संकलित पिसाब मलका रूपमा बिक्री गरेर उनी पनि पैसा कमाउँछन्। नबिकेको पिसाब आफ्नै करेसाबारीको तरकारी खेतीमा प्रयोग गरेर पोटाँस, युरियाजस्ता मलमा खर्च हुने पैसा जोगाउँछन्।
पिसाब संकलनका लागि उनको घर, कार्यालयमा मात्रै होइन, अहिले गाउँभरि नै आधुनिक प्रविधिका चर्पी छन्। यस्तो प्रविधिलाई 'इकोसान' भनिन्छ। अनि यो प्रविधिका स्थानीय अगुवा उनै ५० वर्षीय पोखरेल हुन्। दारेचोक–५ को माझागाउँ माविका प्रधानाध्यापक उनले २०६४ सालमा नेपाल सरकारले प्रअहरूलाई दिएको सरसफाइसम्बन्धी तालिमबाट यो प्रविधि सिकेका थिए। 'तालिममा ४५ मिनेट सरसफाइ, खुला दिसामुक्तिका फाइदाबारे सिकाइएको थियो। त्यही बेला इन्जिनियर नवलकिशोर मिश्रले सिकाएको प्रविधि मैले प्रयोगमा उतारेको हुँ,' पोखरेलले भने।
पिसाब फेर्नेलाई एक रुपैयाँ दिने अभियान चलाईएको चितवन दारेचोक ७ मा रहेको सौचालय।
दिसापिसाब जम्मा हुने गरी अन्य स्थानका भन्दा फरकखाले प्यान प्रयोग गरिएका छन्, त्यहाँका चर्पीमा। दिसापिसाब छुट्टाछुट्टै ठाउँमा जम्मा हुन्छ। 'तरकारी, फलफूलका लागि चाहिने पोटाँस, युरिया, फस्फोरसको काम युरिनले गर्छ,' पोखरेलले भने, 'मानिसको पिसाबमा युरिनको मात्रा सबैभन्दा धेरै हुन्छ। यसले रासायनिक मलको तुलनामा कयौं गुणा बढी काम गर्छ।' पिसाब संकलनका लागि फरक–फरक प्यान भएको चर्पी पोखरेलको सेवा नेपाल कार्यालयमा छ। यसरी संकलित पिसाब तीन सातासम्म बन्द भाँडोमा राख्ने र त्यसपछि प्रयोग गरिने उनले जानकारी दिए।
२०६५ सालतिर अभियान सुरु गर्दा उनलाई स्थानीयले साथ दिएका थिएनन्। सुरुमा उनले विद्यालयवरपरका पाँच घरधुरीलाई पिसाबको फाइदाबारे बुझाए। संकलन तरिका सिकाएर आवश्यक चर्पी निर्माणमा सघाए। अहिले उनको टोल र वडा मात्रै होइन, दारेचोक गाविसका १६ सयमध्ये ७ सय घरमा पिसाब संकलन गर्न मिल्ने चर्पी छ। अभियान सुरु गर्नुअघि बनेका पक्की घरमा पनि शौचालयमा जर्किन, ड्रम राखेर सोलीमार्फत पिसाब संकलन गरिँदै आएको छ। रासायनिकभन्दा यसखाले मलले तरकारी तथा फलफूल खेती सप्रिएपछि किसान उत्साहित भएका हुन्। पोखरेल भन्छन्, 'पहिले त श्रीमतीले नै साथ दिन्नथी। एक्लै थिएँ। अहिले त जम्मा भएको पिसाब कसैलाई बाँडे उल्टै गाली गर्छे।'
गाविसमा इकोसान अभियान विस्तारका लागि पोखरेलले २०६७ देखि तीन वर्ष बेतलबी बिदै लिएका थिए। सरकारी सेवाबापत पाउने सबैखाले बिदा पिसाब संकलन अभियान प्रवर्द्धन गर्दैमा सके। बिदापछि जागिरमा फर्किएको केही समयमै उनको पेन्सन भयो। अहिले पूरै समय इकोसान प्रविधिलाई देशव्यापी बनाउने अभियानमा जुटेका छन्। 'अवकाशपछिको जीवनमा मेरो उद्देश्य भनेकै देशभरिका किसानलाई यो प्रविधि सिकाउनु हो,' पोखरेल भन्छन्, 'अहिले विस्तारै माग बढेको छ, तालिम दिनुपर्यो भन्ने धेरै छन्।'
केही वर्षअघि उनी पृथ्वी राजमार्गछेवैमा शौचालय बनाएर यात्रुको पिसाब संकलन गर्थे। तर, सडक विस्तारका क्रममा शौचालय भत्किएको थियो। अहिले उनी नयाँ योजनासाथ राजमार्गछेउमै पिसाब संकलन केन्द्र बनाउने योजनामा छन्। इकोसान प्रविधिबारे सर्वसाधारणलाई प्रशिक्षण तथा परामर्श दिन 'द सेवा नेपाल' नामक संस्था खोलेका छन्। जहाँ बोर्ड टाँगिएका छन्– 'पिसाब फेर्नुस्, एक रुपैयाँ लैजानुस्।' त्यहाँ पुग्न हाइवेबाट एक किलोमिटर हिँड्नुपर्छ।
इकोसान प्रविधिको प्रवर्द्धनबापत पोखरेल वातावरणीय क्षेत्रका विभिन्न संघसंस्थाबाट सम्मानित समेत भइसकेका छन्। अहिले उनको गाउँमा छिमेकीहरूबीच पिसाबको पैँचो चल्छ। एउटाको घरमा जम्मा भएको पिसाब आवश्यक परेका बेला छिमेकीलाई दिने र पछि सापटी तिर्ने चलन छ। पोखरेल भन्छन्, 'पिसाब फेर्नेलाई एक रुपैयाँ दिँदा नाफा छैन तर अभियानलाई निरन्तरता दिन र प्रविधिको महत्व बुझाउन यसो गरेको हुँ।'
source: http://nagariknews.com/society/nation/story

डिभी परेर पनि सयौं नेपालीको अमेरिका जाने ढोका बन्द



जुलाई महिनाको भिसा बुलेटिनमा अमेरिकी सरकारले  ९ हजार ५ सयसम्म केसनम्बर हुने नेपाली डिभी लोटरी विजेताहरु मात्र अमेरिका आउन पाउने भन्दै अगस्त महिनाका लागि भिसा नम्बर तोकिदियो । त्यतीबेला धेरै डिभी विजेता नेपालीहरुले अगस्त महिनाको भिसा बुलेटिनमा अमेरिकी सरकारले सेप्टेम्बरका लागि भिसा नम्बर जारी गर्दा ९ हजार ५ सय भन्दा माथि केस नम्बर हुनेहरुलाई पनि भिसा नम्बर उपलब्ध गराउने आशा गरेका थिए ।

अमेरिकाले सेप्टेम्बरका लागि पनि ९ हजार ५ सय भन्दा माथि केस नम्बर हुने डिभी लोटरी विजेता नेपालीहरुका लागि भिसा उपलब्ध नहुने भन्दै भिसा बुलेटिन जारी गरेपछि ९ हजार ५ सय भन्दा माथि डिभी लोटरीको केस नम्बर हुने डिभी विजेता नेपालीहरुको अमेरिका आउने ढोका पूर्ण रुपमा बन्द भएको छ । अब उनीहरुको डिभीमार्फत अमेरिका आउने आशा पूर्णरुपमा मृत भएको छ ।

९ हजार ५ सय भन्दा माथि केस नम्बर हुने डिभी लोटरी विजेताहरु ६ सयको हाराहारीमा रहेका छन् । तर एउटा देशबाट ७ प्रतिशत अर्थात् ३५ सयको हाराहारीमामात्र डिभी लोटरी विजेताहरु अमेरिका आउन पाउने भएकाले गतवर्ष डिभी लोटरी पार्न सफल ६ हजार ८२ जनामध्ये कम्तीमा २५ सय नेपालीहरु अमेरिका आउन भने नपाउने निश्चित छ । गत मे महिनामा सन् २०१५ को डिभी लोटरी पार्न सफल ४ हजार ९ सय ९१ नेपालीहरु मध्ये पनि कम्तीमा १४ सय नेपालीहरु अमेरिका आउन नपाउने निश्चित छ ।
चालु आर्थिक वर्षका लागि ६ हजार ८२ जना नेपालीहरुलाई अमेरिकाको डिभी लोटरी परेको थियो । डिभी लोटरीको परिणाम आउँदा नै थाहा थियो, डिभी लोटरी परेका सबैजना अमेरिका आउन पाउनेछैनन् । किनभने अमेरिकाले डिभी लोटरीबाट एक देशबाट हरेकवर्ष ३५ सयको हाराहारीमा मात्र विजेताहरुलाई भिसा दिने गरेको छ । किनभने डिभी लोटरीको नियममा नै अमेरिकाले कुल संख्या झण्डै ५० हजारको ७ प्रतिशतको हाराहारीमा मात्र एउटा देशका लागि डाइभर्सिटी भिसा नम्बर दिने स्पष्ट पारेको छ ।

जस अनुसार अहिलेसम्म कुनै पनि देशले ३५ सयदेखि ३८ भन्दामाथि डाइभर्सिटी भिसा पाएको रेकर्ड छैन । त्यसैले नेपालले पनि ३५ सयको हाराहारीमा भन्दा बढी संख्यामा डाइभर्सिटी भिसा नपाउने निश्चित थियो । जस अनुशार कम्तीमा २५ सय नेपालीहरु अमेरिका आउन नपाउने निश्चित थियो । तर पनि नेपालीहरुले अमेरिका आउन पाउने आशाको त्यान्द्रो भने छाडेका थिएनन् ।
     
यसैबीचमा गत महिना जुलाई महिनाको भिसा बुलेटिन जारी गर्दै अमेरिकाले ९ हजार ५ सय भन्दा माथि केस नम्बर हुने डिभी लोटरी नेपाली विजेताहरुले अमेरिकाको भिसा नपाउने स्पष्ट पारिदियो । अगस्त महिनाको लागि भिसा नम्बर जारी गर्दै अमेरिकाले डिभी लोटरी विजेता नेपालीहरुमाथि सिमाबन्दी तोकिदिएपनि  ९ हजार ५ सय भन्दा माथि केस नम्बर हुने झण्डै ६ सय डिभी लोटरी नेपाली विजेताहरुले झिनो आशा भने मरेको थिएन ।

किनभने अगस्त महिनामा जारी हुने भिसा बुलेटिनमा सेप्टेम्बर महिनाको लागि ९ हजार ५ सय भन्दा माथि केस नम्बर हुनेका लागि पनि अमेरिकाले भिसा नम्बर उपलब्ध गराइदिने झिनो आशा बाँकी थियो । तर अमेरिकाले मंगलबार भिसा बुलेटिन जारी गर्दै सेप्टेम्बर महिनाको लागि पनि ९ हजार ५ सय भन्दा माथि केस नम्बर हुने डिभी लोटरी नेपाली विजेताहरुलाई अमेरिकाको भिसा नदिने स्पष्ट पारेपछि अमेरिका आउने आशा गरेर बसेका ९ हजार ५ सय भन्दा माथि केस नम्बर हुने डिभी लोटरी नेपाली विजेताहरुको अन्तिम आशा पनि मरेको छ ।
डाइभर्सिटी भिसामार्फत अमेरिका आउन पाउने उनीहरुको ढोका मंगलबारदेखि पूर्णरुपमा बन्द भएको छ । अमेरिकाले भिसा बुलेटिनमार्फत ९ हजार ५ सयभन्दा माथि केस नम्बर हुने डिभी लोटरी नेपाली विजेताहरुलाई डाइभर्सिटी भिसा नदिने घोषणा गरेपछि पढाई छोडेर, जागिर छोडेर र सम्पत्ति बेचेर अमेरिका आउने आशामा बसेका सयौं नेपालीको विचल्ली भएको छ ।
         
धेरै नेपालीहरु अमेरिका आइसकेको भन्दै अमेरिकी सरकारले पहिलोपल्ट नेपालका लागि छुट्टै नम्बरमा डाइभर्सिटी भिसा सिमित गरेकाले एसियाका अन्य देशका १३ हजार ३ सय ५० सम्म केस नम्बर भएकाहरुले भिसा पाउने भएपनि ९ हजार ५ सय भन्दा माथि केस नम्बर भएका नेपालीहरुले भने भिसा नपाउने भएका हुन् । अमेरिकाको विदेश मन्त्रालय अन्तरगतको ब्युरो अफ कन्सुलर अफेयर्सले मंगलबार जारी गरेको भिसा बुलेटिन नै सन् २०१४ को डिभी लोटरीका लागि अन्तिम भिसा बुलेटिन हो । 

डिभी लोटरी २०१४ का विजेताहरु भनेका सन् २०१२ मा डिभी चिठ्ठा भरेर सन् २०१३ मा परिणाम प्राप्त गर्नेहरु हुन् । डिभी लोटरी २०१४ का लागि छनौट भएका व्यक्तिका लागि अमेरिकाले अक्टोबर १ २०१३ देखि सन् २०१४ को सेप्टेम्बर ३० सम्म भिसा उपलब्ध गराउनेछ । यो अवधिमा भिसा नपाएकाहरु डिभी लोटरी परेपनि स्वत अयोग्य हुनेछन् । गत वर्ष डिभी लोटरी भरेर यो वर्ष परिणाम प्राप्त गर्नेहरु सन् डिभी लोटरी २०१५ का विजेताहरु हुन् । उनीहरुका लागि भने अक्टोबरबाट  मात्रै अमेरिकी सरकारले भिसा उपलब्ध गराउनेछ । डिभी लोटरी २०१५ को पहिलो परिणाम अनुशार ४ हजार ९ सय ९१ जना नेपालीहरु छनौट भएका थिए । 

गतवर्ष डिभी भरेर यो वर्ष परिणाम हात पारेकाहरुले भने सन् २०१४ को अक्टोबर १ बाट भिसा पाउन थाल्नेछन् । तर उनीहरुमध्ये पनि ३५ सयको हाराहारीमा मात्र डाइभर्सिटी भिसा पाउने भएकाले कम्तीमा १४ सय विजेताहरु अमेरिका आउन नपाउने निश्चित छ ।  डिभी लोटरी परेको भन्दै कैयन नेपालीहरु अमेरिका आउनका लागि तयार भएका बसेका थिए ।  कैयनले आफ्नो पढाई छाडेर बसेका थिए भने  कैयनले घरबार बेचेर बसेका थिए । कैयनले त छँदाखाँदाको जागिर छाडेर बसेका थिए ।  

तर ९ हजार ५ सय भन्दा माथि केस नम्बर हुने नेपाली डिभी विजेताहरुले भिसा नपाउने अमेरिकाको अन्तिम घोषणापछि उनीहरुले अब आफ्नो बिचल्ली हुने बताएका छन् । डिभी परेर पनि अमेरिका आउन नपाएका अमर जोशी भन्छन् –“अन्तिममा डिभी पीडित भइयो । मेरो जिन्दगी नै डामाडोल भयो । १४ महिनासम्म कुरेर अन्तिममा अमेरिका जान नपाउँदा निकै पीडा महसुस भएको छ । म अत्यन्तै नर्भस भएको छु । ”
         
डिभी परेर अमेरिका आउन नपाएपनि उनले दुखेसोसँगै भविश्यप्रतिको आशा भने मारेका छैनन् । उनी भन्छन् –“ अब मज्जाले पढ्छु । कुनै टेन्सन भएन । तर छोरो अमेरिका जाँदैछ भनेर सोंच्नुभएका बुबाआमाले के सोंच्नुहोला भन्ने चिन्ताले पिरोलेको छ । ” त्यस्तै डिभी परेर पनि अमेरिका आउन नपाएका डायमण्ड शर्मा भन्छन् –“हाम्रो लागि अमेरिका सपना हुने भयो । अमेरिकाले डिभी परेकालाई पनि अमेरिका जान नदिएर गल्ती गरेको छ । तर अमेरिकामात्र सबैथोक होइन । यति लामो समय कुरेर अमेरिकाले भिसा नदिदा आशाको पीडादायी अन्त्य भएको छ । मलाई त विश्वास नै गर्न मुस्किल परिरहेको छ । ”

डिभी लोटरीबारे महत्वपूर्ण जानकारीहरु
यदि तपाई डिभी लोटरीमा सहभागी हुन योग्य नरहेको देशमा जन्मनुभएको भएपनि केही परिस्थीतिका कारण डिभी लोटरीका लागि आवेदन दिन योग्य हुन सक्नुहुन्छ । यदि तपाईको दम्पत्ति डिभी लोटरीमा सहभागी हुन योग्य देशमा जन्मनुभएको छ भने तपाईले आफूलाई त्यो देशको तर्फबाट डिभी लोटरीमा सहभागी गराउनसक्नु हुनेछ । तर तपाईको योग्यता तपाईको दम्पत्तिमा आधारित हुनेछ । यदि तपाईको दम्पत्ति डिभी २ भिसाका लागि योग्य भएमा मात्र तपाईले डिभी १ भिसा पाउनुहुनेछ । अनि तपाईहरु दुबैजना एकैपटक अमेरिका प्रवेश गर्नुपर्नेछ । त्यसैगरी तपाईका २१ वर्ष मुनीका छोराछोरीहरु पनि अमेरिका आउन पाउनेछन् ।    
       
अमेरिकामा धेरै व्यक्ति नआएका देशहरुबाट त्यो देशका व्यक्तिलाई अमेरिका आउने अवशर प्रदान गर्नका लागि डिभी लक्ष्यित रहेको हुन्छ । त्यसैले विगतका ५ वर्षमा परिवारको स्पोन्सर र रोजगारका आधारमा कुनै पनि देशबाट ५० हजार भन्दा बढी व्यक्ति अमेरिकामा आएका छन् भने त्यो देशका व्यक्ति डिभी लोटरीका लागि अयोग्य हुन्छन् । हरेक वर्ष अमेरिकाले ५ वर्षमा कुन देशबाट कति व्यक्ति अमेरिकामा आए भन्ने कुराको रुजु गर्छ । त्यसैले यो वर्ष डिभी लोटरीका लागि योग्य देश अर्को वर्ष अयोग्य हुनसक्छ ।

युएससीआईएसले हरेकवर्ष डिभीबाट कति व्यक्ति अमेरिका आउन पाउने भन्ने कुराको निर्धारण गर्छ । गणना पूर्ण भइसकेपछि युएससीआईएसले त्यस्तो नम्बरको घोषणा गर्छ । तर कुनै पनि देशबाट कुल संख्याको ७ प्रतिशतभन्दा बढी व्यक्ति डाइभर्सिटी भिसामा अमेरिका आउन नपाउने नियम रहेको छ । डिभी लोटरीमा सहभागी हुनका लागि हाइस्कुल वा सो सरहको शैक्षिक योग्यता हुन आवश्यक छ । १२ वर्षसम्मको कोर्श पुरा गरेकोलाई त्यो शैक्षिक मान्यता प्रदान गरिदै आएको छ । तर अमेरिकी सरकारको श्रम विभागले तोकेका पेशामा आवद्ध रहेर ५ वर्षको अनुभव बटुलेका व्यक्ति भने शैक्षिक योग्यता नभएपनि डिभी लोटरीमा सहभागी हुन पाउँछन् ।
- खसोखास साप्ताहिक

भनिन्छ तस्विर आँफै बोल्छ, आउनुहोस् सन २०१३ का केही उत्कृष्ट तस्विरहरु हेरौँ

सन् २०१३ सकिनै लाग्दा बीबीसीले यो वर्षका उत्कृष्ट तस्बिरहरु प्रकाशित गरेको छ । यो वर्षका उत्कृष्ट तस्बिरहरुमा यूरोपमा आएको विनाशकारी बाढीदेखि केन्यामा हतियारधारीहरुले गरेको आक्रमणसम्म छन् ।

 
  गत जुनमा यूरोपमा आएको भिषण बाढीका कारण जर्मनीमा एउटा स्वीमिङ पुल जस्ताको तस्तै तर वरिपरी पानी संग्रहित भएको । 

 इन्डोनेशियामा ज्वालामुखि विस्फोट हुँदा ।
 रुसमा स्यार्टर्ड ग्लासका कारण सयौँ व्यक्तिहरु घाइते हुँदा आकाशमा देखिएको दृश्य ।
क्याथोलिक चर्चको नयाँ प्रमुख चुन्ने बेला अर्जेन्टिनामा देखिएको दृश्य ।
 धार्मिक पर्वको अवसरमा खम्बामा दौडिँदै माल्टाका एक पुरुष ।
ब्राजिलको रियो दी जनेरियोमा हड्तालमा उत्रिएका शिक्षकहरुको प्रर्दशन ।
 
केन्याको नैरोवीस्थित एक व्यापारिक भवनमा हतियारधारीहरुले गरेको आक्रमणबाट त्रसित भएर बालिका भाग्दै ।
आफ्नै प्रेमिकाको हत्या आरोप लागेका ओलम्पिक खेलाडी अदालतमा ।
बोइङ ७७७ जहाज सान फ्रान्सिस्कोमा दुर्घटना हुँदा ।
 समलिङ्गी र समलिङ्गी विरोधीहरुको झडपको क्रममा समलिङ्गी अधिकारकर्मीलाई मुक्का हान्दाको दृश्य ।
शत्रु राष्ट्रको रुपमा रहेका अमेरिका र क्यूवाका राष्ट्रपति हात मिलाउँदै ।
 बंगलादेशको व्यापारिक भवन भत्किँदा भएकी घाइते ।

‘डे अफ डक्टर’को दिन बीबीसीले प्रसारण गरेको कार्यक्रममा डक्टरहरु अनौठो रुपमा दिवस मनाउँदै ।

अमेरिकाको बोस्टनमा म्याराथनको क्रममा भएको विस्फोट ।

टर्कीमा सरकार विरोधी प्रर्दशनमा भएका घाइते ।

थाइल्याण्डमा यिङलक सिनावात्राको सरकारको राजीनामा माग्दै भएको प्रदर्शन ।

फिलिपिन्समा आएको आँधीले प्रभावित ।

भारतको गुजरातमा नवरात्रीको दिन हिन्दुधर्मावलम्बीहरु ।

तीव्र दवावपछि राजीनामा दिएका टोरोन्टोका मेयर ।

इन्डोनेशियाको मालीमा इस्लामिक आन्दोलनपछि बच्चासहित घर छाडेर गएकी महिला ।

दक्षिण अफ्रिकाका पूर्व राष्ट्रपति नेल्सन मण्डेलाको अन्तिम संस्कारको बेला ।

सरकारी सेनाको आक्रमणमा परेका साथीलाई उद्धार गर्दै फ्री सिरियन आर्मीका सदस्य ।


 

झ्याल्चा अर्थात् यौन लीला






इन्द्रजात्राको अघिल्लो दिन ललितपुरको च्यासलमा रमाइलो जात्रा देखाइन्छ। त्यो जात्रा हो, झ्याल्चा। इन्द्रजात्राकै एक भागका रूपमा रहेको यो जात्रा ललितपुरमा निकै चर्चित छ। के हो त झ्याल्चा जात्रा
संस्कृतविद् सत्यमोहन जोशीका अनुसार पुरानो परम्परामा आधारित यौन लीला देखाइने जात्रा हो, झ्याल्चा। जुन जात्रा च्यासलबाहेक अरू ठाउँमा देखाइँदैन। यसमा महिला र पुरुषबीचको यौन क्रियाकलापलाई अभिनयमार्फत देखाइन्छ। त्यही दृश्य हेर्न इन्द्रजात्राको अघिल्लो रात च्यासल चोकमा मान्छेको भीड लाग्छ।
‘झ्याल्चा भनेको यौन आसन हो,’ झ्याल्चा गुठीका सदस्य नारायणलाल अवाले भन्छन्, 'मल्लकालीन राजाको अनैतिक कामको विरोधमा यो जात्रा सुरु गरिएको हो।' त्यस बेला राजाले एक युवतीलाई ललाई फकाई यौन क्रियाकलाप गरेको भनाइ छ।
च्यासल चोकमा झ्याल्चा चपा भन्ने घर छ। घरको उत्तरपट्टि मोडामा ठूलो झ्याल छ। त्यही झ्यालमा सेतो पर्दा राखेर भित्र यौन क्रियाकलापको दृश्य देखाइन्छ। पर्दाभित्रको त्यही दृश्य दर्शकले हेर्छन्। झ्याल्चा चपा मल्लकालदेखि रहेको अवाले बताउँछन्।
१६ वर्षदेखि झ्याल्चाको अभिनय गर्दै आएका छन्, झ्याल्चा चपा नजिकका सानुकाजी अवालेले। ४८ वर्षे अवालेलाई यसपालि साथ दिएका थिए, रविन महर्जनले। साथी परिवर्तन भए पनि उनले भने लगातार अभिनयलाई निरन्तरता दिएका छन्। उनी केटीको भूमिकामा खेल्छन्। 'केटीको भूमिका अलि गाह्रो हुन्छ,' अवाले भन्छन्, 'बाजाको तालमा नाच्न जान्नुपर्छ।'
अभिनय गर्नेलाई दुई हप्तादेखि तालिम दिइन्छ। संगीतको तालसँगसँगै अभिनय गर्नुपर्छ। झ्याल्चाका कलाकार सो दिन बिहानैदेखि चोखोनितो बस्छन्। बेलुकापख झ्याल्चा चपाको छेउमा रहेको भीमसेन मन्दिरमा पूजा गर्नुपर्छ। मन्दिरमा भीमसेनको ढड्डा छ। ढड्डासँग अभिनय गर्नुपर्ने अवाले बताउँछन्। सो मन्दिरमा पूजा गरेपछि कसैलाई नछोई झ्याल्चा चपाभित्र प्रवेश गर्नुपर्छ।
एक जनाले राजाको मुकुट लगाउँछन्। अर्को युवतीको भेषमा हुन्छन्। झ्यालमा सेतो पर्दा टाँगिन्छ। भित्र बत्ती बालिन्छ। यसले गर्दा दर्शकले भित्रको छायाँचित्रलाई प्रस्ट देख्न सक्छन्।
करिब एक घन्टासम्म अभिनय चल्छ।
अभिनयमा राजाको युवतीसँग भेट, भलाकुसारी र उनलाई फकाएको अभिनय हुन्छ। युवतीलाई राजाले सम्भोग गरेको दृश्य झ्याल्चाको प्रमुख आकर्षण हो।
सानुकाजीका अनुसार झ्याल्चा पाँच दृश्यमा देखाइन्छ। पहिलो दृश्यमा दुई पात्र मिलेर पूजा गर्छन्, योमरी खान्छन्। दोस्रो चरणमा युवतीले बत्ती काटेको दृश्य हुन्छ। युवतीले झुल्दै बत्ती कात्दा युवकले झस्काइरहन्छ। तेस्रोमा युवकले युवतीलाई सम्भोगका लागि आग्रह गर्छ। युवती सहमत नहुँदा नहुँदै पनि पछि यौन क्रियाकलाप हुन्छ।
चौथो तरणमा युवतीले नै आग्रह गर्छे। युवक मान्दैन। पछि यौन लीला हुन्छ। पाँचौमा युवकले आग्रह गर्छ। युवती मन्जुरी जनाउँछे। अन्तिममा फेरि ढड्डालाई पूजा गरेपछि झ्याल्चा सकिन्छ।
झ्याल्चालाई व्यवस्थित रूपमा सञ्चालन गर्न झ्याल्चा गुठी नै छ। गुठीमार्फत जात्रा सञ्चालन हुने नारायणलाल बताउँछन्। 
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इन्द्रजात्राको अघिल्लो दिन ललितपुरको च्यासलमा रमाइलो जात्रा देखाइन्छ। त्यो जात्रा हो, झ्याल्चा। इन्द्रजात्राकै एक भागका रूपमा रहेको यो जात्रा ललितपुरमा निकै चर्चित छ। के हो त झ्याल्चा जात्रा
संस्कृतविद् सत्यमोहन जोशीका अनुसार पुरानो परम्परामा आधारित यौन लीला देखाइने जात्रा हो, झ्याल्चा। जुन जात्रा च्यासलबाहेक अरू ठाउँमा देखाइँदैन। यसमा महिला र पुरुषबीचको यौन क्रियाकलापलाई अभिनयमार्फत देखाइन्छ। त्यही दृश्य हेर्न इन्द्रजात्राको अघिल्लो रात च्यासल चोकमा मान्छेको भीड लाग्छ।
झ्याल्चा भनेको यौन आसन हो,’ झ्याल्चा गुठीका सदस्य नारायणलाल अवाले भन्छन्, 'मल्लकालीन राजाको अनैतिक कामको विरोधमा यो जात्रा सुरु गरिएको हो।' त्यस बेला राजाले एक युवतीलाई ललाई फकाई यौन क्रियाकलाप गरेको भनाइ छ।
च्यासल चोकमा झ्याल्चा चपा भन्ने घर छ। घरको उत्तरपट्टि मोडामा ठूलो झ्याल छ। त्यही झ्यालमा सेतो पर्दा राखेर भित्र यौन क्रियाकलापको दृश्य देखाइन्छ। पर्दाभित्रको त्यही दृश्य दर्शकले हेर्छन्। झ्याल्चा चपा मल्लकालदेखि रहेको अवाले बताउँछन्।
१६ वर्षदेखि झ्याल्चाको अभिनय गर्दै आएका छन्, झ्याल्चा चपा नजिकका सानुकाजी अवालेले। ४८ वर्षे अवालेलाई यसपालि साथ दिएका थिए, रविन महर्जनले। साथी परिवर्तन भए पनि उनले भने लगातार अभिनयलाई निरन्तरता दिएका छन्। उनी केटीको भूमिकामा खेल्छन्। 'केटीको भूमिका अलि गाह्रो हुन्छ,' अवाले भन्छन्, 'बाजाको तालमा नाच्न जान्नुपर्छ।'
अभिनय गर्नेलाई दुई हप्तादेखि तालिम दिइन्छ। संगीतको तालसँगसँगै अभिनय गर्नुपर्छ। झ्याल्चाका कलाकार सो दिन बिहानैदेखि चोखोनितो बस्छन्। बेलुकापख झ्याल्चा चपाको छेउमा रहेको भीमसेन मन्दिरमा पूजा गर्नुपर्छ। मन्दिरमा भीमसेनको ढड्डा छ। ढड्डासँग अभिनय गर्नुपर्ने अवाले बताउँछन्। सो मन्दिरमा पूजा गरेपछि कसैलाई नछोई झ्याल्चा चपाभित्र प्रवेश गर्नुपर्छ।
एक जनाले राजाको मुकुट लगाउँछन्। अर्को युवतीको भेषमा हुन्छन्। झ्यालमा सेतो पर्दा टाँगिन्छ। भित्र बत्ती बालिन्छ। यसले गर्दा दर्शकले भित्रको छायाँचित्रलाई प्रस्ट देख्न सक्छन्।
करिब एक घन्टासम्म अभिनय चल्छ।
अभिनयमा राजाको युवतीसँग भेट, भलाकुसारी र उनलाई फकाएको अभिनय हुन्छ। युवतीलाई राजाले सम्भोग गरेको दृश्य झ्याल्चाको प्रमुख आकर्षण हो।
सानुकाजीका अनुसार झ्याल्चा पाँच दृश्यमा देखाइन्छ। पहिलो दृश्यमा दुई पात्र मिलेर पूजा गर्छन्, योमरी खान्छन्। दोस्रो चरणमा युवतीले बत्ती काटेको दृश्य हुन्छ। युवतीले झुल्दै बत्ती कात्दा युवकले झस्काइरहन्छ। तेस्रोमा युवकले युवतीलाई सम्भोगका लागि आग्रह गर्छ। युवती सहमत नहुँदा नहुँदै पनि पछि यौन क्रियाकलाप हुन्छ।
चौथो तरणमा युवतीले नै आग्रह गर्छे। युवक मान्दैन। पछि यौन लीला हुन्छ। पाँचौमा युवकले आग्रह गर्छ। युवती मन्जुरी जनाउँछे। अन्तिममा फेरि ढड्डालाई पूजा गरेपछि झ्याल्चा सकिन्छ।
झ्याल्चालाई व्यवस्थित रूपमा सञ्चालन गर्न झ्याल्चा गुठी नै छ। गुठीमार्फत जात्रा सञ्चालन हुने नारायणलाल बताउँछन्। 
झ्याल्चा अर्थात् यौन लीला 
 
 
तीनचार सय वर्षअघिदेखिको यो प्रविधिलाई विदेशीले पनि निकै प्रशंसा गरेको बताउँछन्, नारायणलाल। जुनबेला दृश्य, फिल्म भनेको कल्पना पनि थिएन। पहिले पहिले केटीहरूले लुकीलुकी हेर्ने गरेको जोशी बताउँछन्। 'पहिले फिल्म भन्ने थिएन। केटाकेटी झ्याल्चा भनेपछि हुरुक्कै हुन्थे,' जोशीले भने, 'केटाकेटी बेलामा खुबै हेरियो हामीले पनि।' अहिले भने केटाकेटीदेखि बूढाबूढी एकै ठाउँ जम्मा हुन्छन्। जात्रा हेर्नेको संख्या हरेक वर्ष बढ्दो छ। 'यसपालि जात्रा हेर्नेको संख्या निकै ठूलो भयो,' सानुकाजीले भने।
कसरी सुरु भयो
सिद्धिनरसिंह मल्ल ललितपुरका राजा भएका बेला पाटन दरबारको वरिपरि धेरै कृषक थिए। वर्षाको काम सकिएपछि स्थानीय बासिन्दा चोकचोकमा बत्ती काटेर बस्थे।
चोकमा बसेकी सुन्दर युवती देख्दा घुम्दै आएका राजा मोहित भए। उनको सुन्दरतामा लठ्ठिए। युवती व्यञ्जनकार समुदायकी थिइन्।
युवतीबाट लोभिएका राजा नियमितजसो उनकै घर जान थाले। दरबारमा रानी छँदाछँदै अर्की रानी ल्याउने कुरै भएन। हरेक दिन युवतीकै घर गएर मिठामिठा कुरा गरेर फकाउन थाले। बिस्तारै मायाजालमा फसाएर यौन क्रियाकलाप गर्न थाले।
राजा हरेक दिन युवती भेट्न जान्छन् भन्ने हल्ला जताततै फैलियो। जनतालाई एक किसिमको त्रास पनि भयो। राम्री केटी देखेपछि राजाले नछोडने रै'छन् भन्ने भयो। चेलीबेटी असुरक्षित भएको महसुस गरे जनताले।
'
कि बिहे गरेर दरबारमा भिœयाउनु, नभए युवतीलाई भेट्न जनताको घरमा नआउनू' भन्ने आवाज उठ्यो।
त्यतिबेला राजाको प्रत्यक्ष विरोध गर्ने अवस्था थिएन। अप्रत्यक्ष रूपमा राजाको सो अनैतिक गतिविधिको विरोध जनाउन उनका क्रियाकलापलाई पर्दामा अभिनयमार्फत देखाउन सुरु गरिएको हो। 
source:" nagariknews.com/nagarik-sanibar/story/7645
इन्द्रजात्राको अघिल्लो दिन ललितपुरको च्यासलमा रमाइलो जात्रा देखाइन्छ। त्यो जात्रा हो, झ्याल्चा। इन्द्रजात्राकै एक भागका रूपमा रहेको यो जात्रा ललितपुरमा निकै चर्चित छ। के हो त झ्याल्चा जात्रा
संस्कृतविद् सत्यमोहन जोशीका अनुसार पुरानो परम्परामा आधारित यौन लीला देखाइने जात्रा हो, झ्याल्चा। जुन जात्रा च्यासलबाहेक अरू ठाउँमा देखाइँदैन। यसमा महिला र पुरुषबीचको यौन क्रियाकलापलाई अभिनयमार्फत देखाइन्छ। त्यही दृश्य हेर्न इन्द्रजात्राको अघिल्लो रात च्यासल चोकमा मान्छेको भीड लाग्छ।
‘झ्याल्चा भनेको यौन आसन हो,’ झ्याल्चा गुठीका सदस्य नारायणलाल अवाले भन्छन्, 'मल्लकालीन राजाको अनैतिक कामको विरोधमा यो जात्रा सुरु गरिएको हो।' त्यस बेला राजाले एक युवतीलाई ललाई फकाई यौन क्रियाकलाप गरेको भनाइ छ।
च्यासल चोकमा झ्याल्चा चपा भन्ने घर छ। घरको उत्तरपट्टि मोडामा ठूलो झ्याल छ। त्यही झ्यालमा सेतो पर्दा राखेर भित्र यौन क्रियाकलापको दृश्य देखाइन्छ। पर्दाभित्रको त्यही दृश्य दर्शकले हेर्छन्। झ्याल्चा चपा मल्लकालदेखि रहेको अवाले बताउँछन्।
१६ वर्षदेखि झ्याल्चाको अभिनय गर्दै आएका छन्, झ्याल्चा चपा नजिकका सानुकाजी अवालेले। ४८ वर्षे अवालेलाई यसपालि साथ दिएका थिए, रविन महर्जनले। साथी परिवर्तन भए पनि उनले भने लगातार अभिनयलाई निरन्तरता दिएका छन्। उनी केटीको भूमिकामा खेल्छन्। 'केटीको भूमिका अलि गाह्रो हुन्छ,' अवाले भन्छन्, 'बाजाको तालमा नाच्न जान्नुपर्छ।'
अभिनय गर्नेलाई दुई हप्तादेखि तालिम दिइन्छ। संगीतको तालसँगसँगै अभिनय गर्नुपर्छ। झ्याल्चाका कलाकार सो दिन बिहानैदेखि चोखोनितो बस्छन्। बेलुकापख झ्याल्चा चपाको छेउमा रहेको भीमसेन मन्दिरमा पूजा गर्नुपर्छ। मन्दिरमा भीमसेनको ढड्डा छ। ढड्डासँग अभिनय गर्नुपर्ने अवाले बताउँछन्। सो मन्दिरमा पूजा गरेपछि कसैलाई नछोई झ्याल्चा चपाभित्र प्रवेश गर्नुपर्छ।
एक जनाले राजाको मुकुट लगाउँछन्। अर्को युवतीको भेषमा हुन्छन्। झ्यालमा सेतो पर्दा टाँगिन्छ। भित्र बत्ती बालिन्छ। यसले गर्दा दर्शकले भित्रको छायाँचित्रलाई प्रस्ट देख्न सक्छन्।
करिब एक घन्टासम्म अभिनय चल्छ।
अभिनयमा राजाको युवतीसँग भेट, भलाकुसारी र उनलाई फकाएको अभिनय हुन्छ। युवतीलाई राजाले सम्भोग गरेको दृश्य झ्याल्चाको प्रमुख आकर्षण हो।
सानुकाजीका अनुसार झ्याल्चा पाँच दृश्यमा देखाइन्छ। पहिलो दृश्यमा दुई पात्र मिलेर पूजा गर्छन्, योमरी खान्छन्। दोस्रो चरणमा युवतीले बत्ती काटेको दृश्य हुन्छ। युवतीले झुल्दै बत्ती कात्दा युवकले झस्काइरहन्छ। तेस्रोमा युवकले युवतीलाई सम्भोगका लागि आग्रह गर्छ। युवती सहमत नहुँदा नहुँदै पनि पछि यौन क्रियाकलाप हुन्छ।
चौथो तरणमा युवतीले नै आग्रह गर्छे। युवक मान्दैन। पछि यौन लीला हुन्छ। पाँचौमा युवकले आग्रह गर्छ। युवती मन्जुरी जनाउँछे। अन्तिममा फेरि ढड्डालाई पूजा गरेपछि झ्याल्चा सकिन्छ।
झ्याल्चालाई व्यवस्थित रूपमा सञ्चालन गर्न झ्याल्चा गुठी नै छ। गुठीमार्फत जात्रा सञ्चालन हुने नारायणलाल बताउँछन्। 
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